है। यह सभ्यता के भीतर उसी तरह व्याप्त रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूलों में सुगंध और सभ्यता की अपेक्षा यह टिकाऊ भी अधिक है,क्योंकि सभ्यता की सामग्रियां फूट-फूटकर विनष्ट हो जा सकती हैं, लेकिन, संस्कृति का विनाश इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता। एक बात और है किस सभ्यता के उपकरण जल्दी से बटोरे भी जा सकते हैं, मगर, उनके उपयोग के लिए संस्कृति चाहिए, वह तुरंत नहीं आ सकती जो आदमी अचानक धनी हो जाता है या एक-ब-एक किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाता है, उसे चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी में एक शब्द ‘अपस्टार्ट’ है। ‘अपस्टार्ट’को लोग बुरा समझते हैं और इसलिए बुरा नहीं समझते कि अचानक धनी हो जाना या एक-ब-एक किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाना कोई बुरी बात है, वरन, इसलिए की धनियों तथा ऊंचे ओहदेवालों की जो संस्कृति है, वह तुरंत सीखी नहीं जा सकती।
इसलिए ऊंचे ओहदे पर पहुँचा हुआ व्यक्ति यदि पहले से अधिक विनयशील नहीं हो जाए,तो वह चिढ़ाने लायक हो जाता है। संस्कृति ऐसी चीज नहीं है जिसकी रचना दस, बीस या सौ, पचास-वर्षों में की जा सकती हो।अनेक शताब्दियों तक एक समाज के लोग जिस तरह खाते- पीते, रहते-सहते, पढ़ते-लिखते, सोचते-समझते, और राजकाज चलाते 10th - - अथवा धर्म-कर्म करते हैं उन सभी कार्यों से उनकी संस्कृति उत्पन्न होती है। हम जो भी करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है।यहाँ तक कि हमारे उठने-बैठने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने, और रोने-हंसने से भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है,यद्यपि हमारा कोई भी एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता। असल में, संस्कृति जि ं दगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं।
इसलिए जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज से मिलकर हम जी रहे हैं उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, यद्यपि अपने जीवन में हम जो भी संस्कार जमा करते हैं वह भी हमारी संस्कृति का अंग बन जाता है और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ देते हैं। इसलिए, संस्कृति