📖 Samacheer Kalvi · SSLC - English Medium · Hindi · Page 8poem

STANDARD - X

Chapter 1: 10th Hindi Reader Text www.tntextbooks.in · Hindi

STANDARD - X कवि परिचय: कबीरदास भक्तिकाल की ज्ञानमार्गी शाखा के प्रतिनिधि कवि थे। वे अनपढ़ थे। रहस्यवादी कवि थे। उनका जन्म सं. में हुआ था। नीरू और नीमा दंपति ने कबीर का पालन पोषण किया था। बचपन से ही कबीर धर्म परायण थे। वे ईश्वर को निराकार, निरंजन तथा सर्वातर्यामी मानते थे। वे मूर्ति पूजा के कट्टर विरोधी थे। बड़े समाज सुधारक थे। साखी, सबद, रमैनी कबीरदास की रचनाएँ हैं। जो ‘बीजक’ नामक ग्रंथ में संग्रहित हैं। उनकी भाषा सधुक्कड़ी है। कबीरदास ( ) जाको राखै साँइयाँ, मारि न सकै कोय। बाल न बाँका करि सकै, जो जग बैरी होय।। संदर्भ : इसमें भगवान की महिमा बताई गई है । व्याख्या : कबीरदास कहते हैं- भगवान जिसकी रक्षा करता है, उसे कोई मार नहीं सकता। चाहे सारी दुनिया उनकी शत्रु हो जाए तो भी उसका कुछ भी नुकसान नहीं हो सकता। (इसलिए हरेक को भगवान की कृपा प्राप्त करनी चाहिए) कठिन शब्दार्थ : जाको-जिसको, राखै-रक्षा करता है। साँइयाँ-भगवान, बाल बाँका न करना - जरा-सा नुकसान नहीं पहुँचाना। ( ) साधु ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय। सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय।। संदर्भ : इसमें साधु के स्वभाव की विशेषता बतायी गयी है। व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं साधु का स्वभाव सूप के समान होता है जो सारत्व को ग्रहण कर लेता है और थोथी वस्तु अर्थात तत्वहीन वस्तु को छोड़ देता है। कठिन शब्दार्थ : सूप-अनाज साफ करने का छाज, सुभाय-स्वभाव, गहि रहे-ग्रहण करता है, थोथा-निस्सार।

Related topics

Have a question about this topic?

Get an AI answer grounded in your actual textbook — with the exact page reference.

Ask AI about this topic →