अयोध्यासि ह उपाध्याय ‘हरिऔध’
Chapter 1: nºÉ´ÉÒÆ EòIÉÉ · Hindi · HI medium
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अयोध्यासि ह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं। यत्न करने में कभी जी को चुराते हैं नहीं।। बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए। वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए।। चिलचिलाती धूप को जो चांदनी देते बना। काम पडने पर करें जो शेर का भी सामना।। जो कि हँस-हँस के चबा लेते हैं लोहे का चना। है कठिन कुछ भी नहीं जिनके है जी में यह ठना।। कोस कितने ही चलें पर वे कभी थकते नहीं। कौन-सी है गाँठ जिसको खोल वे सकते नहीं।। काम को आरंभ करके यूँ नहीं जो छोड़ते। सामना करके नहीं जो भूल कर मुंह मोड़ते।। वे गगन के फूल बातों से व्यथा नहीं तोड़ते। संपदा मन से करोड़ों की नहीं जो जोड़ते।। बन गया हीरा उन्हीं के हाथ से है कारवान। काँच को करके दिखा देते हैं वे उज्ज्वल रतन।।
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अयोध्यासि ह उपाध्याय ‘हरिऔध’ आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं। यत्न करने में कभी जी को चुराते हैं नहीं।। बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए। वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए।।
चिलचिलाती धूप को जो चांदनी देते बना। काम पडने पर करें जो शेर का भी सामना।। जो कि हँस-हँस के चबा लेते हैं लोहे का चना। है कठिन कुछ भी नहीं जिनके है जी में यह ठना।।
कोस कितने ही चलें पर वे कभी थकते नहीं। कौन-सी है गाँठ जिसको खोल वे सकते नहीं।। काम को आरंभ करके यूँ नहीं जो छोड़ते। सामना करके नहीं जो भूल कर मुंह मोड़ते।।
वे गगन के फूल बातों से व्यथा नहीं तोड़ते। संपदा मन से करोड़ों की नहीं जो जोड़ते।। बन गया हीरा उन्हीं के हाथ से है कारवान। काँच को करके दिखा देते हैं वे उज्ज्वल रतन।।
पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे। सैकड़ों मरुभूमि में नदियाँ बहा देते हैं वे।। गर्भ में जल-राशि के बेड़ा चला देते हैं वे। जंगलों में भी महामंगल रचा देते हैं वे।।
भेद नभतल का उन्होंने है बहुत बतला दिया। है उन्होंने ही निकाली तार की सारी क्रिया।। सब तरह से आज इतने देश है फूले-फले। बुद्धि, विद्या, धन, वैभव के हैं जहाँ डेरे डले।।
वे बनाने से उन्हीं के बन गए इतने भले। वे सभी हैं हाथ से ऐसे सपूतों के पले।। लोग जब ऐसे समय पाकर जन्म लेगें कभी। देश की और जाति की होगी भलाई भी तभी।।
कठिन शब्दार्थ - जी-मन, मुंह ताकना-किसी के भरोसे बैठे रहना,नमूना-आदर्श जिसका अनुकरण किया जाए,लोहे के चने चबाना-अत्यंत कठिन कार्य को करना, आंख खुलना-उलझन दूर करना, विभव-शक्ति, प्रभुत्व, मदद-सहायता, मरुभूमि-रेगिस्तान । I) सप्रसंग व्याख्या कीजिए। . आज करना है .....................
..................इस जगत में आप ही। . जो कभी अपने समय............... ...................औरों के लिए।
. चिलचिलाती धूप को............... ...................खोल वे सकते नहीं। .
पर्वतों को काटकर................... .....................की सारी क्रिया। II)‘कर्मवीर’ कविता का सारांश लिखिए। कवि परिचय: रसखान दिल्ली के पठान थे।
वे वल्लभ संप्रदाय के गोस्वामी विट्ठलनाथ के शिष्य थे। गुरु से दीक्षा लेकर वे भगवान कृष्ण के भक्त बन गये। उनकी रचनाओं में भक्ति, शृंगार एवं वात्सल्य रस की प्रधानता है। रसखान की रचनाएँ हैं- ( ) प्रेम वाटिका और ( ) सुजान रसखान, प्रेमवाटिका में प्रेम के महत्व का वर्णन है।
सुजान रसखान में प्रेम और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। रसखान . मानुष हौं तौ वही रसखानि, बसौं ब्रज-गोकुल-गाँव के ग्वारन । जो पसु हौं तौं कहा बसु मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ।।
पाहन हौं तौं वही गिरि कौ, जो धर्यौं कर छत्र पुरंदर-धारन । जो खग हौं तौं बसेरो करौं, मिली कालि दीकूल कदंब की डारन ।। प्रसंग : कवि रसखान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो कृष्ण जहाँ रहते हैं, वहीं होना चाहिए।
व्याख्या : रसखान प्रार्थना करते हैं कि यदि मुझे अगले जन्म में मनुष्य का जन्म मिले तो व्रज भूमि-गोकुल-गाँव के ग्वाले के घर में जन्म मिले। पशु का जन्म हो तो नंद की गाय के रूप होना चाहिए जिसे रोज़ श्रीकृष्ण चरने ले जाएँगे। पत्थर के रूप में जन्म हो तो वे गोवर्धन गिरि का पत्थर बनना पसंद करेंगे। जिसे श्रीकृष्ण ने छत्र बनाकर लोगों को अति वर्षा से बचाया था।
पक्षी के रूप में जन्म हो तो कालि दी नदी के कदंब के पेड़ पर के घोंसले में होना चाहिए। रसखान अपनी अनन्य भक्ति के कारण हर जन्म में कृष्ण के संपर्क में रहना चाहते हैं। विशेष : पठान रसखान की श्रीकृष्ण के संपर्क में रहने की कामना हिन्दू धर्म और कृष्ण की महिमा का उदाहरण है।
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