मैथिलीशरण गुप्त
Chapter 1: nºÉ´ÉÒÆ EòIÉÉ · Hindi · HI medium
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मैथिलीशरण गुप्त सुरभित, सुंदर सुमन तुझ पर खेलते हैं, भांति-भांति के सरस सुधोपम फल मिलते हैं, औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली, खानें शोभित कहीं धातु से एक निराली, जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं, हे मातृभूमि, वसुधा, धरा तेरे नाम यथार्थ है।। दीख रही है कहीं दूर पर शैलश्रेणी, कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी, नदियाँ पैर पसार रही है बनकर चेरी, पुष्पों से तरु-राशि कर रही पूजा तेरी, मृदु मलय वायु मानो तुझे चंदन चारु चढ़ा रही, हे मातृभूमि, किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही।। क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है, सुधामयी, वात्सल्यमयी तू प्रेममयी है, विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुखहत्री है, भय निवारण, शांतिकारिणीसुखकर्त्री है। हे शरणादायिनी देवी तू करती सब का त्राण है।
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मैथिलीशरण गुप्त सुरभित, सुंदर सुमन तुझ पर खेलते हैं, भांति-भांति के सरस सुधोपम फल मिलते हैं, औषधियाँ हैं प्राप्त एक से एक निराली, खानें शोभित कहीं धातु से एक निराली, जो आवश्यक होते हमें, मिलते सभी पदार्थ हैं, हे मातृभूमि, वसुधा, धरा तेरे नाम यथार्थ है।। दीख रही है कहीं दूर पर शैलश्रेणी, कहीं घनावलि बनी हुई है तेरी वेणी, नदियाँ पैर पसार रही है बनकर चेरी, पुष्पों से तरु-राशि कर रही पूजा तेरी, मृदु मलय वायु मानो तुझे चंदन चारु चढ़ा रही, हे मातृभूमि, किसका न तू सात्विक भाव बढ़ा रही।। क्षमामयी, तू दयामयी है, क्षेममयी है, सुधामयी, वात्सल्यमयी तू प्रेममयी है, विभवशालिनी, विश्वपालिनी, दुखहत्री है, भय निवारण, शांतिकारिणीसुखकर्त्री है। हे शरणादायिनी देवी तू करती सब का त्राण है।
हे मातृभूमि, संतान हम तू जननी तू प्राण है।।” कठिन शब्दार्थ:- परिधान-पहनावा, मेखला-करधनी,खग-वृन्द-पक्षी-समूह, पवन-वायु हवा, तरू-राशि-वृक्ष समूह, पयोद- मेघ, फर्श-बिछी हुई कालीन, बिछावन शैल श्रेणी-पर्वतों की पंक्ति, चारू-सुंदर, प्रिय क्षेम-मंगल, दुखहर्त्री- दुःख हरने वाली, त्राण-रक्षा। अभ्यास के लिए प्रश्न . मैथिलीशरण गुप्त का जन्म कब और कहाँ हुआ? .
मैथिलीशरण गुप्त की प्रमुख रचनाएँ क्या–क्या हैं? . मैथिलीशरण गुप्त ने अपनी ‘मातृभूमि’ कविता में क्या संदेश दिया है? .
‘मातृभूमि’ कविता का प्रकृति-चित्रण कीजिए। . मैथिलीशरण गुप्त मातृभूमि की संतान किसे मानते हैं? .
मातृभूमि के विविध रूप का परिचय दीजिए। I) सप्रसंग व्याख्या कीजिए। . नीलाम्बर परिधान हरित...............
.........................सगुण मूर्ति सर्वेश की। . क्षमामयी, तू दयामयी है.................... ..............................तू जननी, तू प्राण है।
II) ‘मातृभूमि’ कविता का सारांश लिखिए। कवि परिचय: कविवर रहीम के पिता बैरामखाँ थे, जो क्रमशः बादशाह हुमायूँ तथा अकबर के प्रधान मंत्री थे। अकबर ने उनकी शिक्षा-दीक्षा का संपूर्ण भार अपने ऊपर उठा लिया था और योग्य अध्यापकों को रख संस्कृत, अरबी, फारसी आदि भाषाओं का ज्ञान उन्हें कराया था। रहीम के ग्रंथों में ‘रहीम दोहावली’,‘बरवै नायिका भेद’,‘मंदनाष्टक, रासपंचाध्यायी’ और ‘शृंगार सोरठा’ प्रसिद्ध हैं।
‘बरवै छंद’ के वे आरंभकर्ता हैं। अब्दुर्रहीम खानखाना . माँगे घटत रहीम पद, कितो करौ बड़ काम। तीन पैग बसुधा धरी, तऊ बावनै नाम।।
शब्दार्थ: कितो-कितना ही, पैग-पाँव, वसुधा-भूमि, तऊ-तोभी, बावनै-वामन। भावार्थ : रहीम भी कबीरदास की तरह माँगने की नि दा करते हैं। रहीम कहते हैं कि चाहे कितना भी बड़ा काम करो, दूसरे से कुछ माँगने से पद घट जाता है। बड़ा व्यक्ति छोटा बन जाता है।
भगवान विष्णु ने सारी भूमि की तीन पंगों में नापकर अद्भुत कार्य किया, तब उसका नाम वामन पड़ गया। ऐसा माँगने के कारण हुआ है। यहाँ विष्णु के वामनावतार की कथा की ओर संकेत किया गया है। भगवान विष्णु ने वामन के रूप में राजा बलि से तीन पग जमीन का दान माँगा था।
बलि ने वह दान दे दिया। विष्णु ने भूमि और आकाश को दो पगों में नाप दिया और तीसरे पग के लिए जगह माँगी तो बलि ने अपना सिर प्रस्तुत किया। विष्णु ने राजा बलि को बंदी बनाकर पाताल लोक में भेज दिया और स्वर्ग का राज्य देवताओं को दे दिया। इतना बड़ा काम करने पर भी चूंकि विष्णु ने राजा बलि से दान माँगा था।
अतः वे वामन कहलाने लगे। अर्थातरन्यास अलंकार का सुंदर वर्णन हुआ है।
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