के शिष्य थे। गुरु से दीक्षा लेकर वे भगवान कृष्ण के भक्त बन गये। उनकी रचनाओं में भक्ति, शृंगार एवं वात्सल्य रस की प्रधानता है। रसखान की रचनाएँ हैं- ( ) प्रेम वाटिका और ( ) सुजान रसखान, प्रेमवाटिका में प्रेम के महत्व का वर्णन है।
सुजान रसखान में प्रेम और भक्ति का अद्भुत समन्वय है। रसखान . मानुष हौं तौ वही रसखानि, बसौं ब्रज-गोकुल-गाँव के ग्वारन । जो पसु हौं तौं कहा बसु मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन ।।
पाहन हौं तौं वही गिरि कौ, जो धर्यौं कर छत्र पुरंदर-धारन । जो खग हौं तौं बसेरो करौं, मिली कालि ं दीकूल कदंब की डारन ।। प्रसंग : कवि रसखान श्री कृष्ण के परम भक्त थे। वे श्रीकृष्ण से प्रार्थना करते हैं यदि मेरा पुनर्जन्म हो तो कृष्ण जहाँ रहते हैं, वहीं होना चाहिए।
व्याख्या : रसखान प्रार्थना करते हैं कि यदि मुझे अगले जन्म में मनुष्य का जन्म मिले तो व्रज भूमि-गोकुल-गाँव के ग्वाले के घर में जन्म मिले। पशु का जन्म हो तो नंद की गाय के रूप होना चाहिए जिसे रोज़ श्रीकृष्ण चरने ले जाएँगे। पत्थर के रूप में जन्म हो तो वे गोवर्धन गिरि का पत्थर बनना पसंद करेंगे। जिसे श्रीकृष्ण ने छत्र बनाकर लोगों को अति वर्षा से बचाया था।
पक्षी के रूप में जन्म हो तो कालि ं दी नदी के कदंब के पेड़ पर के घोंसले में होना चाहिए। रसखान अपनी अनन्य भक्ति के कारण हर जन्म में कृष्ण के संपर्क में रहना चाहते हैं। विशेष : पठान रसखान की श्रीकृष्ण के संपर्क में रहने की कामना हिन्दू धर्म और कृष्ण की महिमा का उदाहरण है।