अयोध्यासि ं ह उपाध्याय ‘हरिऔध’ 10th - - आज कल करते हुए जो दिन गँवाते हैं नहीं। यत्न करने में कभी जी को चुराते हैं नहीं।। बात है वह कौन जो होती नहीं उनके लिए। वे नमूना आप बन जाते हैं औरों के लिए।।
चिलचिलाती धूप को जो चांदनी देते बना। काम पडने पर करें जो शेर का भी सामना।। जो कि हँस-हँस के चबा लेते हैं लोहे का चना। है कठिन कुछ भी नहीं जिनके है जी में यह ठना।।
कोस कितने ही चलें पर वे कभी थकते नहीं। कौन-सी है गाँठ जिसको खोल वे सकते नहीं।। काम को आरंभ करके यूँ नहीं जो छोड़ते। सामना करके नहीं जो भूल कर मुंह मोड़ते।।
वे गगन के फूल बातों से व्यथा नहीं तोड़ते। संपदा मन से करोड़ों की नहीं जो जोड़ते।। बन गया हीरा उन्हीं के हाथ से है कारवान। काँच को करके दिखा देते हैं वे उज्ज्वल रतन।।
पर्वतों को काटकर सड़कें बना देते हैं वे। सैकड़ों मरुभूमि में नदियाँ बहा देते हैं वे।। गर्भ में जल-राशि के बेड़ा चला देते हैं वे। जंगलों में भी महामंगल रचा देते हैं वे।।
भेद नभतल का उन्होंने है बहुत बतला दिया। है उन्होंने ही निकाली तार की सारी क्रिया।। सब तरह से आज इतने देश है फूले-फले। बुद्धि, विद्या, धन, वैभव के हैं जहाँ डेरे डले।।
10th - - वे बनाने से उन्हीं के बन गए इतने भले। वे सभी हैं हाथ से ऐसे सपूतों के पले।। लोग जब ऐसे समय पाकर जन्म लेगें कभी। देश की और जाति की होगी भलाई भी तभी।।
कठिन शब्दार्थ - जी-मन, मुंह ताकना-किसी के भरोसे बैठे रहना,नमूना-आदर्श जिसका अनुकरण किया जाए,लोहे के चने चबाना-अत्यंत कठिन कार्य को करना, आंख खुलना-उलझन दूर करना, विभव-शक्ति, प्रभुत्व, मदद-सहायता, मरुभूमि-रेगिस्तान । I) सप्रसंग व्याख्या कीजिए। . आज करना है .....................
..................इस जगत में आप ही। . जो कभी अपने समय............... ...................औरों के लिए।
. चिलचिलाती धूप को............... ...................खोल वे सकते नहीं। .
पर्वतों को काटकर................... .....................की सारी क्रिया। II)‘कर्मवीर’ कविता का सारांश लिखिए। 10th - - कवि परिचय: रसखान दिल्ली के पठान थे।
वे वल्लभ संप्रदाय के गोस्वामी विट्ठलनाथ