बदला आरिगपूडी आधुनिक हिन्दी कहानी के विकास में आपका महत्वपूर्ण स्थान है व आप आधुनिक हि ं दी कहानी निर्माताओं में से एक थे। भाव, भाषा एवं शैली की दृष्टि से ये कहानियाँ आधुनिक कहानी का प्रतिनिधित्व करती हैं। 10th - - अस्पताल के फाटक के पास पहुँचा तो रोक दिया गया। बहुत मिन्नत करने के बाद और चवन्नी हाथ में थमाने के बाद, दरबान ने उसे अंदर जाने दिया।
शायद कुछ सफर के कारण या किसी और कारण, अस्पताल में घुसते ही उसकी पत्नी बेहोश हो गई। कोटय्या ने सोचा कि लोग भागे-भागे आयेंगे....दो चार आये भी पर जिनको आना चाहिए था, वे नहीं आये। अस्पताल है शायद वहाँ बेहोशी भी मामूली बात है। किसी को मनाया, किसी के हाथ जोड़े, किसी के पैरो पड़ा, पर सब यूँ देखकर चलते हुए जैसे उससे भी अधिक कोई सीरियस बीमार हो और वे उसको देखने में लगे हों।
कोटय्या दुकानदार न था, अस्पताल भी पहली बार आया था, पहली बार उसकी पत्नी गर्भवती हुई थी। पैसेवाला न था कि पैसे की करामात जानता। इतना जना-सुना भीन था कि उस अस्पताल में बिना “मामूल” के मुर्दे भी नहीं हटाए जाते थे। वह चि ं तित खड़ा रहा।
पसीना-पसीना हो गया, घुटने थरथराने लगे। हट्टा-कट्टा आदमी, काँपने लगा....भय, विवशता, अज्ञान, अंधकार। कुछ देर बाद ए कलेटी ड़क्टर आई, बाद में उसको पता लगा कि उनका नाम पद्मा था। उन्होंने कोटय्या की पत्नी को अंदर भरती करवा दिया नर्सों ने उनके सामने उसे देखा-भाला भी और कोटय्या बाहर खड़ा-खड़ा भगवान को हाथ जोड़ रहा था।
“....कुछ भी हो....सुशीला जाती रहे, बच्चा हो तो भला, न हो तो भला पर वह ज़िन्दी रहे, हे भगवान.......।” नर्से अंदर आ जा रही थीं, उस कमरे में और भी कई मरीज़ थे। कोटय्या उनके आता जाता देख, न मालूम क्या-क्या सोच रहा था......ऐसा भी क्या हो गया सुशीला को, कि इन लोगों की इतनी भागदौड़ मची हुई है। उसकी फिक्र बढ़ी उसका डर बढ़ा। कुछ देर बाद, उसको बताया गया कि प्रसव के पहले ही, उसकी पत्नी के प्राण चले गये।
वह लंबी साँसे खींचता अंदर गया। उसने देखा कि उसकी पत्नी वहीं पड़ी थी,