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कबीरदास

Chapter 2: कबीरदास · Hindi

कबीरदास 10th - - ( ) जा घट प्रेम न संचरै, सो घट जान मसान। जैसे खाल लोहार की, साँस लेत बिनु प्रान।। संदर्भ : इसमें प्रेमहीन व्यक्ति के बारे में बताया गया है। व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं जिस हृदय में प्रेम का संचार नहीं होता, उसे मृत समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति प्राण रहित साँस लेने वाली लोहार की धौंकनी के समान है। लोहार की धौंकनी प्राणों के न होने पर भी साँस लेती है, उसी प्रकार साँस लेने पर भी प्रेमहीन व्यक्ति प्राण रहित होता है। कठिन शब्दार्थ : जा-जिस, घट-शरीर, सो-वह, संचरै-संचार होता है, लोहार की खाल-लोहार की धौंकनी, बिनु-बिना। ( ) जिन ढूँढा तिन पाइयाँ, गहरे पानी पैठि। मैं बपुरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठि।। संदर्भ : इसमें बताया गया कि साहस करने वाले को ही सब कुछ मिलता है। व्याख्या : कबीरदास जी कहते हैं जिन लोगों ने समुद्र के गहरे पानी में जाकर कुछ ढूँढा है, उन लोगों ने अमूल्य रत्नों को प्राप्त किया। जो बेचारा डूबने से डरा वह किनारे पर ही बैठा रहा। अर्थात कुछ भी प्राप्त नहीं कर पाया। कठिन शब्दार्थ : जिन-जिन्होंने, तिन-वे लोग, पाइयाँ-प्राप्त किया, पैठि-घुसकर, प्रेवश कर, बपुरा-बेचारा अभ्यास के लिए प्रश्न . संत कबीर के बारे में आप क्या जानते हैं? . कबीर ने ईश्वर की महिमा का वर्णन कैसे किया है? . कबीर दास ने प्रेम के महत्व को कैसे बताया? . कबीर का साधु के बारे में विचार क्या है? . कबीर ने परिश्रम के फल के बारे में क्या कहा है? 10th - - कवि परिचय: सन् में आजमगढ़ (उत्तर प्रदेश) में ‘हरिऔध’ जी का जन्म हुआ।‘हरिऔध’ द्विवेदी युग के एक प्रमुख कवि हैं। ‘खड़ीबोली’ की रचनाओं के कारण आपको प्रसिद्धि मिली। आप एक कुशल वक्ता और सफल अध्यापक भी थे। सन् ईस्वी में आपकी सर्वप्रथम रचना ‘प्रियप्रवास’ महाकाव्य का प्रकाशन हुआ। आपकी अन्य काव्य रचनाएँ हैं ‘चुभते-चौपदे’, ‘चोखे- चौपदे’ और ‘पारिजात’।‘हरिऔध’ जी ने प्रकृति के साथ-साथ राष्ट्रीयता की भावना को भी उजागर किया है। कविवर हरिऔध जी कर्म के महत्व को दर्शाते हुए परिश्रमी लोगों की प्रशंसा करते हैं।भाग्य के भरोसे बैठे रहने वाले की अपेक्षा पुरुषार्थ करके लक्ष्य को प्राप्त करने वाले ही कर्मवीर कहलाते हैं। सच्चे कर्मवीर कभी बातें नहीं बनाते, बाधाओं से विचलित नहीं होते और संघर्ष से मुंह नहीं मोड़ते। वे कठिन-से-कठिन कार्य को भी अपने परिश्रम से संभव कर दिखाते हैं। समाज और देश की उन्नति ऐसे ही कर्म वीरों के पुरुषार्थ पर निर्भर होती है। देश के नवयुवकों को लगन और मेहनत की सीख देने वाली प्रेरक कविता। अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ ‘’आज करना है जिसे करते उसे हैं आज ही। सोचते कहते हैं जो कुछ कर दिखाते हैं वही।। मानते जी की हैं सुनते हैं सदा सबकी कहीं। जो मदद करते हैं अपनी इस जगत में आप ही॥ भूल कर भी दूसरों का मुंह कभी ताकते नहीं। कौन ऐसा काम है वे कर जिसे सकते नहीं।। जो कभी अपने समय को यूँ बिताते हैं नहीं। काम करने की जगह बातें बनाते हैं नहीं।।

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