📖 Samacheer Kalvi · SSLC - English Medium · Hindi · Page 69question

मिठाईवाला

Chapter 18: मिठाईवाला · Hindi

मिठाईवाला पं. भगवती प्रसाद वाजपेयी 10th - - मुन्नू बोला - “औल देखो, मेला कैछा छुन्दल ऐ?” दोनों अपने हाथी-घोड़े लेकर घर भर में उछलने लगे। इन बच्चों की माँ रोहिणी कुछ देर तक खड़े-खड़े उनका खेल निरखती रही। अन्त में दोनों बच्चों को बुलाकर उसने पूछा - “अरे ओ चुन्नू - मुन्नू, ये खिलौने तुमने कितने में लिए है?” मुन्नू बोला - “दो पैछे में!

खिलौनेवाला दे गया ऐ।” रोहिणी सोचने लगी - इतने सस्ते कैसे दे गया है? कैसे दे गया है, यह तो वही जाने। लेकिन दे तो गया ही है, इतना तो निश्चय है! एक जरा-सी बात ठहरी।

रोहिणी अपने काम में लग गई। फिर कभी उसे इस पर विचार की आवश्यकता भी भला क्यों पड़ती। छह महीने बाद। नगर भर में दो-चार दिनों से एक मुरलीवाले के आने का समाचार फैल गया।

लोग कहने लगे - “भाई वाह! मुरली बजाने में वह एक ही उस्ताद है। मुरली बजाकर, गाना सुनाकर वह मुरली बेचता भी है सो भी दो-दो पैसे भला, इसमें उसे क्या मिलता होगा। मेहनत भी तो न आती होगी!” एक व्यक्ति ने पूछ लिया - “कैसा है वह मुरलीवाला, मैंने तो उसे नहीं देखा!” उत्तर मिला - “उम्र तो उसकी अभी अधिक न होगी, यही तीस-बत्तीस का होगा।

दुबला-पतला गोरा युवक है, बीकानेरी रंगीन साफा बाँधता है।” “वही तो नहीं, जो पहले खिलौने बेचा करता था?” “क्या वह पहले खिलौने भी बेचा करता था?’ “हाँ, जो आकार-प्रकार तुमने बतलाया, उसी प्रकार का वह भी था।” “तो वही होगा। पर भई, है वह एक उस्ताद।” 10th - - प्रतिदिन इसी प्रकार उस मुरलीवाले की चर्चा होती। प्रतिदिन नगर की प्रत्येक गली में उसका मादक, मृदुल स्वर सुनाई पड़ता - “बच्चों को बहलानेवाला, मुरलियावाला।” रोहिणी ने भी मुरलीवाले का यह स्वर सुना। तुरन्त ही उसे खिलौनेवाले का स्मरण हो आया।

उसने मन ही मन कहा - “खिलौनेवाला भी इसी तरह गा-गाकर खिलौने बेचा करता था।” रोहिणी उठकर अपने पति विजय बाबू के पास गई - “जरा उस मुरलीवाले को बुलाओ तो, चुन्नू-मुन्नू के लिए ले लूँ। क्या पता यह फिर इधर आए, न आए। वे भी, जान पड़ता

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