वह चीज मानी जाती है जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए हैं तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है बल्कि संस्कृति हमारा पीछा जन्म जन्मांतर तक करती है। अपने यहां एक साधारण कहावत है जिसका जैसा संस्कार है उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है। जबहम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते हैं तब हम अचानक ही कह उठते हैं कि यह पूर्व जन्म का संस्कार है। संस्कार या संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है और जब की सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है।
आदिकाल से हमारे लिए जो लोग काव्य और दर्शन रचने आए हैं, चित्र और मूर्ति बनाते आए हैं, वह हमारी संस्कृति के रचयिता है। आदिकाल से हम जिस-जिस रूप में शासन चलाते आए हैं, पूजा करते आए हैं, मंदिर और मकान बनाते आए हैं, नाटक और अभिनय करते आए हैं,बर्तन और घर के दूसरे सामान बनाते आए हैं, कपड़े और जेवर पहनते आए हैं, पर्व और त्योहार मनाते आए हैं, परिवार पड़ोसी और संसार से दोस्ती या दुश्मनी का जो भी सलूक करते आए हैं, सब-का-सब हमारी संस्कृति का ही अंश है। संस्कृति के उपकरण हमारे पुस्तकालय और संग्रहालय म्यूजियम नाटक शाला और सिनेमा गृह ही नहीं बल्कि हमारे राजनीतिक और आर्थिक संगठन भी होते हैं, क्योंकि उन पर भी हमारी रुचि और चरित्र की छाप लगी होती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है।
जब भी दो देश वाणिज्य-व्यापार अथवा शत्रुता या मित्रता के कारण आपस में मिलते हैं तब उनकी संस्कृतियां एक-दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं, ठीक उसी प्रकार, जैसे दो व्यक्तियों की संगति का प्रभाव दोनों पर पड़ता है। संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो जो यह दावा कर सके कि उस पर किसी अन्य देश की संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ा है। इसी प्रकार, कोई जाति भी यह नहीं जान सकती कि उस पर किसी दूसरी जाति का प्रभाव नहीं है। जो जाति केवल देना ही है, जानती है लेना