📖 Samacheer Kalvi · SSLC - English Medium · Hindi · Page 59question

रामधारी सि ं ह ‘दिनकर’

Chapter 16: रामधारी सि ं ह ‘दिनकर’ · Hindi

रामधारी सि ं ह ‘दिनकर’ 10th - - और महल बना कर नहीं रहते थे।फूस की झोपड़ियों में वास करना, जंगल के जीवन से दोस्ती और प्यार करना, किसी भी मोटे काम को अपने हाथ से करने में हिचकिचाहट नहीं दिखती,पत्तों में खाना और मिट्टी के बर्तनों में रसोई पकाना, यही उनकी जि ं दगी थी यह लक्षण आज की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार के लक्षण नहीं माने जाते है।,फिर भी वे ऋषिगण सुसंस्कृत ही नहीं थे बल्कि वह हमारी जाति की संस्कृति का निर्माण करते थे। सभ्यता और संस्कृति में यह एक मौलिक भेद है, जिसे समझे बिना हमें कहीं-कहीं कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। मगर, यह कठिनाई कहीं-कहीं ही आती है।साधारण नियम यही है कि संस्कृति की सभ्यता की प्रगति, अधिकतर एक साथ होती है और दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव भी पड़ता रहता है।उदाहरण के लिए जब हम कोई घर बनाने लगते हैं, तब स्थूल रूप से यह सभ्यता का कार्य होता है। मगर, हम घर का कौन-सा नक्शा पसंद करते हैं, इसका निर्णय हमारी संस्कृति की रुचि करती है और संस्कृति की प्रेरणा से हम जैसा घर बनाते हैं, वह सिर्फ सभ्यता का अंग बन जाता है।

इस प्रकार सभ्यता का संस्कृति पर और संस्कृति का सभ्यता पर पड़ने वाले प्रभाव का क्रम निरंतर चलता ही रहता है। यही एक बात यह भी समझ लेनी चाहिए की संस्कृति और प्रकृति में भी भेद है। गुस्सा करना मनुष्य की प्रकृति है, लोभ में पड़ना उसका स्वभाव है, ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष और कामवासना ये सब-के-सब प्रकृति प्रदत्त गुण हैं मगर, प्रकृति के ये गुण बेरोक छोड़ दिए जाएँ तो आदमी और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाएगा। इसलिए, मनुष्य प्रकृति के इन आवेगों पर रोक लगाता है और कोशिश करता है कि वह गुस्से के बस में नहीं बल्कि गुस्सा ही उसके बस में रहे; वह ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष और कामवासना का गुलाम नहीं रहे,बल्कि, ये दुर्गुण उसके गुलाम रहें और इन दुर्गुणों पर आदमी जितना विजयी होता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊंची समझी जाती है।

निष्कर्ष यह है कि संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती

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