रसखान 10th - - शब्दार्थ : धेनु-गाय, पसु-पशु, ग्वारन-ग्वाला,कूल-किनारा,डारन-डाली, पाहन-पत्थर,चर-चरना, . मोर-पंखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी। ओढ़ि पीताम्बर ले लकुटी बन, गोधन ग्वारिनसंग फिरौंगी।। भावतो वोहि मेरे ‘रसखानि’, सो तेरे कहे सब स्वांग भरौंगी। या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरी अधरान धरौंगी।। प्रसंग : यह पद्यांश रसखान रचित ‘रसखान लहरी’ से दिया गया है। व्याख्या : मुगल पठान होने पर भी कृष्ण के प्रति रसखान की अनन्य भक्ति का परिचय मिलता है। रसखान श्रीकृष्ण प्रेमी होने से उनकी हर चाल का अनुसरण करना चाहते हैं। गोपिका बनकर वे कृष्ण की वेश-भूषा में मोहित होकर कहते हैं कि मैं कृष्ण की तरह सिर पर पंख रखूँगी। गले में गुंजों की माला पहनूँगी। पीतांबर पहनकर गायें चराने हाथ में लाठी लेकर वन में जाऊँगी। श्रीकृष्ण की मुरली को अपने अधरों में रखकर बजाऊँगी। विशेष : भक्तों को अपने ईश्वर जैसी वेश-भूषा धारण करने में बड़ा आनंद आता है। आज भी कृष्ण जयंती के दिन अपने पुत्रों का भी कृष्णालंकार करके माता-पिता प्रसन्न होते हैं। यह मनुष्य का स्वभाव है। शब्दार्थ: मोर-मयूर, पहिनैंगी-पहनूँगी, स्वांग-नाटक, अभिनय, अधरान-ओंठ . सेस महेस गणेश दिनेस, सुरेसहुँ जाहि निरंतर गावैं । जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुवेद बतावें ।। नारद से सुक व्यास रटै, पचि हारे तऊ पुनि पार न पावैं । ताहि अहीर की छोहरियाँ, छछिया भरि छाछपे नाच नचावैं ।। भावार्थ : ज्ञान, ध्यान, तप, वैराग्य, भक्ति ये सब भगवत प्राप्ति के मार्ग हैं, लेकिन इन सबमें भक्ति को सुलभ मार्ग कहा गया है। भक्ति के बस में आकर भगवान भक्तों के कैसे निकट आते हैं और लीलाएं करते हैं। उसकी 10th - - एक झाँकी इस सवैये में दिखाई गई है। सहस्त्र मुखों के आदिशेष, भगवान महेश्वर समस्त देवगणों के अध्यक्ष विनायक, प्रकाश के देवता, सूर्य और देवराज इन्द्र, जिसका गुणगान निरंतर करते हैं, जिसको श्रेष्ठ वेद (उपनिषद) आदि और अनंत (शाश्वत) तथा अखंड और अच्छेद्य व अभेद कहकर वर्णित करते हैं और नारद से लेकर व्यास शुक तक के भक्त महर्षि जिसका गुणगान निरंतर करते हुए भी तंग आकर थक जाते हैं, किन्तु पास नहीं पहुँच पाते, अर्थात पूर्णतः जान नहीं
📖 Samacheer Kalvi · SSLC - English Medium · Hindi · Page 14poem
रसखान
Chapter 4: रसखान · Hindi
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