संत विनोबा 10th - - नहीं कराती अर्थात जीवन और शिक्षा का कोई संबंध नहीं रह गया है। ऐसी स्थिति मंञ मनुष्य की अवस्था दयनीय हो जाती है और वह जीवन को भयानक वस्तु समझने लगता है। इस दोष से बचने के लिए क्या करना चाहिए और वह कैसे किया जा सकता है इन सब बातों का विवेचन प्रस्तुत निबंध में किया गया है। शिक्षा में जीवन के प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करा देने की आवश्यकता पर विनोबा जी ने बल दिया है।
जीवन और शिक्षण आज की विचित्र शिक्षण पद्धति के कारण जीवन के दो टुकड़े हो जाते हैं। आयु के पहले पन्द्रह-बीस वर्षों में आदमी जीने की झंझट में न पड़कर सिर्फ शिक्षा को प्राप्त करे और बाद को शिक्षण को बस्ते में लपेट रखकर मरने तक जिये। यह रीति प्रकृति की योजना से विरूद्ध है। हाथ भर लंबाई का बालक साढ़े तीन हाथ का कैसे हो जाता है।
यह उसके अथवा औरों के ध्यान में भी नहीं आता। शरीर की वृद्धि रोज़ होती रहती है। यह वृद्धि सावकाश, क्रम-क्रम से, थोड़ी-थोड़ी होती है। इसलिए उसके होने का भान तक नहीं था।
यह नहीं होता कि आज रात को सोवे तब दो फुट ऊँचाई थी और सबेरे उठकर देखा तो ढाई फुट हो गयी। आज की शिक्षण-पद्धति का तो यह ढंग है कि अमुक वर्ष से बिल्कुल आखिरी दिन तक मनुष्य जीवन के विषय में पूर्ण रूप से गैर जिम्मेदार रहे तो भी कोई हर्ज नहीं, यही नहीं उसे गैर जिम्मेदार रहना चाहिए और आगामी वर्ष का पहला दिन निकला कि सारी जिम्मेदारी उठा लेने की तैयारी हो जाना चाहिए। सम्पूर्ण गैर जिम्मेदारी से सम्पूर्ण जिम्मेदारी में कूदना तो एक हनुमान-कूद ही हुई। ऐसी हनुमान-कूद की कोशिश में हाथ पैर टूट जाए तो क्या?
भगवान ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में भगवत गीता कहीं। पहले भगवत गीता की‘क्लास’ लेकर अर्जुन को कुरुक्षेत्र में नहीं ढकेला, तभी उसे वह गीता पची। हम जिसे जीवन की तैयारी का ज्ञान कहते हैं उसे जीवन से बिल्कुल अलग तरह रखना चाहिए, इसलिए उस ज्ञान से मौत की ही तैयारी होती है। बीस वर्ष का उत्साही पुरुष अध्ययन में मगन है तरह-तरह