फिर मैं रुपया तुड़वाकर तीनों को पैसे दूंगी।” खाना खाते-खाते हिसाब लगाया। तीनों में बराबर पैसे कैसे बंटे? छोटा कुछ पैसे कम लेने की बात पर बिगड़ पड़ा- ’’कभी नहीं, मैं कम पैसे नहीं लूंगा!’’ दोनों में मारपीट हो चुकी होती, यदि मुन्नी थोड़े कम पैसे स्वयं लेना स्वीकार न कर लेती। कई महीने बीत गए। सावित्री की सब हींग खत्म हो गई। इस बीच होली आई। होली के अवसर पर शहर में खासी मारपीट हो गई थी। सावित्री कभी- कभी सोचती, हींग वाला खान तो नहीं मार डाला गया? न जाने क्यों, उस हींग वाले खान की याद उसे प्राय: आ जाया करती थी। एक दिन सवेरे-सवेरे सावित्री उसी मौलसिरी के पेड़ के नीचे चबूतरे पर बैठी कुछ बुन रही थी। उसने सुना, उसके पति किसी से कड़े स्वर में कह रहे हैं- ‘’क्या काम है?’ भीतर मत जाओ। यहाँ आओ। ‘’उत्तर मिला-’’हींग है, हेरा हींग।’’ और खान तब तक आंगन मैं सावित्री के सामने पहुँच चुका था। खान को देखते ही सावित्री ने कहा- ‘’बहुत दिनों में आए खान! हींग तो कब की खत्म हो गई।” खान बोला- ‘’अपने देश गया था अम्मां, परसों ही तो लौटा हूँ। ‘’ सावित्री ने कहा- ‘’ यहाँ तो बहुत जोरों का दंगा हो गया है।’’ खान बोला-’’सुना, समझ नहीं है लड़ने वालों में।” सावित्री बोली-’’खान, तुम हमारे घर चले आए। तुम्हें डर नहीं लगा?” दोनों कानों पर हाथ रखते हुए खान बोला-’’ऐसी बात मत करो अम्मां। बेटे को भी क्या मां से डर हुआ है, जो मुझे होता?”और इसके बाद ही उसने अपना डिब्बा खोला और एक छटांक हींग तोलकर सावित्री को दे दी। रेजगारी दोनों में से किसी के पास नहीं थी। खान ने कहा कि वह पैसा फिर आकर ले जाएगा। सावित्री को सलाम करके वह चला गया। इस बार लोग दशहरा दूने उत्साह के साथ मनाने की तैयारी में थे। चार बजे शाम को मां काली का जुलूस निकलने वाला था। पुलिस का काफी प्रबंध था। सावित्री के बच्चों ने कहा- “हम भी काली का जुलूस देखने जाएंगे ।” सावित्री के पति शहर से बाहर गए थे। सावित्री स्वभाव से भीरु थी। उसने बच्चों को पैसों का, खिलौनों
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