जी को जाट गजट का सपादक बनाया था। केवल इसलिये कि वह पक्के आर्यसमाजी थे और आर्य समाजी समाज सुधारर होते हैं। एक गोरे पादरी के साथ टक्कर लेने से गोरा शाही सुदर्शन जी से चिढ़ गई। चौ. छोटूराम, चौ. लालचन्द से आर्यसमाजी सपादक को हटाने का दबाव बनाया। चौ. छोटूराम अड़ गये। सरकार की यह बात नहीं मानी। यह घटना प्रथम विश्व युद्ध के दिनों की है। सुदर्शन जी - में रोहतक में कार्यरत थे। सुदर्शन लाला राजारम ने दफतर से आते ही क्रोध-भरे स्वर में अपनी स्त्री से कहा,-“शादी ने आज फिर चोरी की।” कौशल्या लड़की के लिए कुर्ता सी रही थी, पति की आवाज सुनकर उसने सिर उठाया और आश्चर्य के साथ बोली,- “बड़ी पाजी लड़का है। रोज मार खाता है, मगर इसका आँखें नहीं खुलती। आज क्या चुराया है?” “कल रात जेब में सवा रुपया रखा था, आज दफ्तर जाकर देखा तो रुपया था, चवन्नी न थी, बस इसी के हाथ लग गयी होगी, कहाँ है?” जरा बुलाओ तो पूछूँ। कौशल्या का कलेजा धड़कने लगा उसने समझ लिया कि आज फिर लड़की की खैर नहीं, झूठी हँसी हँसकर बोली, “तुम कपड़े तो बदल लो, दफ्तर से थककर आये हो, आते ही क्रोध करोगे, तो स्वास्थ्य बिगड़ जाएगा।”
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