विष्णु प्रभाकर 10th - - सड़क के किनारे एक सुंदर फ्लैट में बैठक का दृश्य। उसका एक दरवाजा सड़क वाले बरामदे में खुलता है। दूसरा अंदर के कमरे में। तीसरा रसोईघर में।
अलमारियों में पुस्तकें लगी हैं। एक ओर रेडियो का सेट है। दोनो ओर दो छोटे तख्त हैं, जिन पर गलीचे बिछे हैं। बीच में एक छोटी मेज़ भी है।
उस पर फोन रखा है। पर्दा उठने पर मोहन एक तख्त पर लेटा है। आठ-नौ वर्ष के लगभग उम्र होगी उसकी। तीसरी क्लास में पढ़ता है।
इस समय बड़ा बेचैन जान पड़ता है। बार-बार पेट को पकड़ता है। उसके माता-पिता पास बैठे हैं। माँ : (पुचकारकर) न-न, ऐसे मत कर!
अभी ठीक हुआ जाता है। अभी डॉक्टर को बुलाया है। ले. तब तक सेंक ले।
(चादर हटाकर पेट पर बोतल रखती है फिर मोहन के पिता की ओर मुड़ती है) इसने कहीं कुछ अंट-संट तो नहीं खा लिया? पिता : कहाँ? कुछ भी नहीं। सिर्फ एक केला और एक संतरा खाया था।?
अरे, यह तो दफ्तर से चलने तक कूटता फिर रहा था। बस अड्डे पर आकर यकायक बोला- पिताजी, मेरेपेट में तो कुछ ‘ऐसे-ऐसे’ हो रहा है। माँ : कैसे? पिता : बस ‘ऐसे-ऐसे’ करता रहा।
मैंने कहा- अरे, गड़बड़ होती है? तो बोला – नहीं। फिर पूछा –चक-सा चुभता है? तो जवाब दिया – नहीं।
गोला-सा फूटता है, तो बोला – नहीं। जो पूछा उसका जवाब नहीं। बस एक ही रट लगाता रहा, कुछ ‘ऐसे-ऐसे’ होता है। पिता : अजी, एक दम सफेद पड़ गया था।
खड़ी नहीं रहा गया। बस में भी नाचता रहा-मेरे पेट में ‘ऐसे-ऐसे’ होता है। ‘ऐसे-ऐसे’ होता है। मोहन : (जोर से कराहकर) माँ!
अरे माँ! माँ : न-न मेरे बेटे, मेरे लाल, ऐसे नहीं। अजी, ज़रा देखना डॉक्टर क्यों नहीं आया है। इसे को कुछ ज्यादा ही तकलीफ जान पड़ती है।
यह ‘ऐसे-ऐसे’ तो कोई बड़ी खराब बीमारी है। देना ना, कैसे लोट रहा है। ज़रा भी कल नहीं पड़ती। हींग, चूरन, पिपरमेंट सब दे चुकी हूँ।
वैद्य जी आ जाते। (तभी फोन की घंटी बजती है। मोहन के पिता उठाते हैं) पिता : यह 43332224 है। जी,