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विष्णु प्रभाकर · Part 2

Chapter 14: विष्णु प्रभाकर · Hindi

जी हाँ। बोल रहा हूँ....कौन? डॉक्टर साहब। जी हाँ, मोहन के पेट में दर्द है......जी नहीं.

खाया तो कुछ नहीं......बस यही कह रहा है......बस जी, ‘ऐसे-ऐसे’ होता है। बस जी ‘ऐसे-ऐसे’। यह जी...जी हाँ। चेहरा एक दम सफेद हो रहा है।

नाचा....... 10th - - नाचता-फिरता है.......जी नहीं, दस्त तो नहीं आया पर जी हाँ, पेशाब तो आया था लेिकन जी नहीं, रंग तो नहीं देखा। आप कहें तो अब देख लेंगेअच्छा जी। ज़रा जल्दी आइए।

अच्छा जी, बड़ी कृपा है। (फोन का चोंगा रख देते हैं।) डॉक्टर साहब चल दिए हैं। पाँच मिनिट में आ जाते हैं। (पड़ोस के लाला (दीनानाथ का प्रवेश।

मोहन ज़ोर से कराहता है।) मोहन : माँ.......माँ.......ओ.........ओ (उलटी आ जाती है उठकर नीचे झुकता है। माँ सिर पकड़ती है। मोहन तीन-चार बार ओ.......ओ......करता है। थूकता है, फिर लेट जाता है।

हाय, हाय! माँ : (कमर सहलाती हुई) क्या हो गया? दोपहर को भला-चंगा गया था। कुछ समझ में नहीं आता।

कैसा पड़ा है। नहीं तो मोहन भला कब पड़ने वाला है। हर वक्त घर को सिर पर उठाए रहता है। दीनानाथ : अजी, घर क्या, पड़ोस को भी गुलज़ार किए रहता है।

इसे छेड़, उसे पछाड़, इसके मुक्का, उसके थप्पड़। यहाँ-वहाँ, हर कहीं मोहन ही मोहन। पिता : बडा नटखट है। माँ : पर अब तो बेचारा कैसा थक गया है।

मुझे तो डर है कि कल स्कूल कैसे जाएगा। दीनानाथ : जी हाँ, कुछ बड़ी तकलीफ है, तभी तो पड़ा। मामूली तकलीफ को तो यह कुछ समझता नहीं। पर कोई डर नहीं।

मैं वैद्य जी से कह आया हूँ। वे आ ही रहे हैं। ठीक कर देंगे। मोहन : (तेजी से कराहकर) अरे...रे...रे....रे....ओह!

माँ : (घबराकर) क्या है, बेटा? क्या हुआ? मोहन : (रोआँसा-सा) बड़े जोर से ऐसे-ऐसे होता है। ऐसे-ऐसे।

माँ : ऐसे-कैसे, बेटे? ऐसे क्या होता है? मोहन : ऐसे-ऐसे (पेट दबाता है) (वैद्य जी का प्रवेश) वैद्य जी : कहाँ है मोहन? मैंने कहा, खुदा भला करें।

कहो बेटा खेलने से जी भर-गया क्या? कोई धमा-चौकड़ी करने को नहीं बची है क्या? 10th - - (सब उठकर हाथ जोड़ते हैं वैद्य जी मोहन के पास

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