अब्दुर्रहीम खानखाना 10th - - . रहिमन जिह्वा बावरी, कहि गइ सरग पताल। आपु तो कहि भीतर गयी, जूती खात कपाल।। शब्दार्थ: जिह्वा-जीभ, बावरी-पगली, कहिगइ-कह गयी, सरग पताल-ऊँच-नीच, भला-बुरा, आपु-स्वयं, कपाल- सिर। भावार्थ : रहिमन कहते हैं यह जीभ बड़ी पगली है, वह भला-बुरा जो सूझा कह देती है। वह तो कहकर भीतर चली जाती है, लेकिन उसका फल या कुफल सर को भोगना पड़ता है। दूसरे की नि ं दा जीभ करती है परंतु जूती सिर पर पड़ती है। भाव यह है कि मुंह से बात निकालने के पहले खूब सोच समझ कर लेना चाहिए। . अन्तर दाव लगी रहै, धुवाँ न प्रगटै सोई। कै जिय आपन जानही, कै जिहि बीती होइ।। शब्दार्थ: दाव-दावग्नि, चिन्ता की ज्वाला, कै-या:, जिय-हृदय, आपन-आप, जानही-जानता है, जिहि-जिस पर। भावार्थ : चिन्ता की ज्वाला अंदर ही अंदर दावाग्नि की तरह जलती रहती है। उसका धुआँ (चि ं ता के लक्षण) बाहर प्रकट नहीं होते। उसकी वेदना तो हृदय ही जानता है। जिस पर से होकर वह गुजरी हो वही जानता है। भाव यह है कि चि ं ता की वेदना और तीव्रता या तो स्वयं अनुभव करने वाला जानता है या तो जिसने इसके पहले उसका अनुभव किया हो, वह जानता है। अन्य लोग उसको नहीं समझ सकते। दावाग्नि वह अग्नि है जो जंगल में गर्मियों के समय अपने आप लग जाती है और अनेक पेड़-पौधों और वन्य प्राणियों को जला डालती है। उसी प्रकार चि ं ता भी मनुष्य के उत्साह और उसकी खुशियों को नष्ट कर देती है। चि ं ता ग्रस्त मनुष्य बाहर से शांत दिखने पर भी अंदर ही अंदर घुलता रहता है। . रहिमन विपदाहू भली, जो थोरे दिन होइ। हित अनहित या जगत में, जानि परत सब कोइ।। शब्दार्थ: विपदाहू-विपत्ति भी, हित-भलाई चाहने वाला, हित-चि ं तक, अनहित-अहित चि ं तक शत्रु। 10th - - भावार्थ : रहीम कहते हैं यदि थोड़े दिन हो तो विपत्ति भी भलाई करती है क्योंकि उससे यह मालूम होता कि इस दुनिया में उसका कौन हित चि ं तक है और कौन अहित चि ं तक है। सुख और संपत्ति के दिनों में
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अब्दुर्रहीम खानखाना
Chapter 6: अब्दुर्रहीम खानखाना · Hindi
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