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आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी

Chapter 12: आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी · Hindi

आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी 10th - - जिसके पास आवश्यकता से थोड़ा भी अधिक धन हो जाता है वह अपने आप को अर्थात यों कहिए अपनी आत्मा को, अपने वश में नहीं रख सकता, क्योंकि संतोष न होने के कारण वह उस धन को प्रतिदिन बढ़ाने का यत्न करता है। अतएव वह धन किस काम का जो लोभ को बढ़ाता जाए? भूख लगने पर भोजन कर लेने से तृप्ति हो जाती है। प्यास लगने पर पानी पी लेने से तृप्ति हो जाती है परंतु धन से तृप्ति नहीं होती।

उसे पाकर और भी लोभ बढ़ता है, इसलिए धनी होना एक प्रकार का रोग है। रात को जाड़े से बचने के लिए एक लिहाफ काफी होता है। यदि किसी के ऊपर आठ,दस लिहाफ डाल दिए जाएं, तो उसे बोझ मालूम होने लगेगा और उल्टा कष्ट होगा। इसीलिए धनाढ्यता भी एक प्रकार की बीमारी है जिससे भरसक रोग हो जाता है।

वह खाता ही चला जाता है उसे कभी तृप्ति नहीं होती। जिसे धनाढ्यता का रोग हो जाता है वह भी कभी प्राप्त नहीं होता। तृप्ति का न होना अर्थात आवश्यकताओं का बढ़ जाना ही दुख का कारण है। और दुख है, वहाँ सुख रह ही नहीं सकता।

उन दोनों में परस्पर बैर है। अतएव उसी को धनी समझना चाहिए जिसकी आवश्यकताएं कम है, क्योंकि वह थोड़े में तृप्त हो जाता है तृप्ति ही सुख है और लोभ ही दुख है। संतोष निरोगता का लक्षण है, लोभ बीमारी का लक्षण है। जो मनुष्य खाते-खाते संतुष्ट नहीं होता उसे अधिक खिलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, उसके लिए वैध की आवश्यकता होती है।

ऐसे मनुष्य को अधिक खिलाने की अपेक्षा उनके खाए हुए पदार्थ को वमन कराके बाहर निकालना पड़ता है क्योंकि अनावश्यक अथवा आवश्यकता से अधिक पदार्थ पेट में रहने से रोग हुए बिना नहीं रहता। इसी तरह जिनको संतोष नहीं अर्थात जो लोग प्रतिदिन अधिक से अधिक धन इकट्ठा करने के यत्न में लगे रहते हैं उनको अधिक देने की अपेक्षा उनसे कुछ छीन लेना अच्छा है, क्योंकि जब कोई वस्तु कम हो जाती है तब मनुष्य बची हुई से संतोष करता है। अतएव संतोष होने से उसे सुख

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