ऐसा श्रेष्ठ गुण है कि जिसके न होने से पुरुष में पौरुषत्व का अभाव कहना अनुचित नहीं मालूम होता, जिनको अपने भरोसे का बल है, वे जहाँ होंगे जल में तुRबी के समान संत के ऊपर रहेंगे, ऐसे ही के चरित्र पर लक्ष्य कर महाकवि भारती ने कहा है कि तेज और प्रताप से संसार भर को अपने नीचे करते हुए ऊँची उमंग वाले दूसरों के द्वारा अपना वैभव नहीं बढ़ाना चाहते। शारीरिक बल, चतुरंगिनी सेना का बल, प्रभुता का बल, मंत्र-तंत्र का बल इत्यादि जितने बल हैं निज बहु-बल के आगे सब क्षीण बल हैं। आत्मनिर्भरता की बुनियादी यह बाहुबल सब तरह के बलों को सहारा देने वाला और उभारने वाला है। यूरोप के देशों की जो इतनी उन्नति है तथा अमेरिका, जापान आदि जो इस समय मनुष्य जाति के सरताज हो रहे हैं, इसका यही कारण है कि उन देशों में लोग अपने भरोसे पर रहना या कोई काम करना अच्छी तरह जानते हैं।
हिन्दुस्तान का जो सत्यानाश है इसका यही कारण है कि यहाँ के लोग अपने भरोसे पर रहना ही भूल गये हैं। इसी से सेवकाई करना यहाँ के लोगों से जैसे खूबसूरती के साथ बन पड़ता है। वैसा स्वामित्व नहीं, अपने भरोसे पर रहना जब हमारा गुण नहीं तब क्यों कर संभव है कि हारे में प्रभुत्व शक्ति को अवकाश मिले। निरी किस्मत और भाग्य पर वे ही लोग रहते हैं, जो आलसी हैं।
किसी ने अच्छा कहा है- “दैव,दैव आलसी पुकारा।” ईश्वर भी ज्ञानानुकूल और सहायक उन्हीं का होता है जो अपनी सहायता अपने आप कर सकते हैं। अपने आप अपनी सहायता करने की वासना आदमी में सच्ची तरक्की की बुनियादी है। अनेक सुप्रसिद्ध सत्पुरुषों की जीवनियाँ इसके उदाहरण तो हैं ही, वरन् प्रत्येक देश या जाति के लोगों में बल और ओज तथा गौरव और महत्व के आने का सच्चा इकरार मात्र निर्भरता है। बहुधा देखने में आता है कि किसी काम के करने में बाहरी सहायता इतना लाभ नहीं पहुँच सकती जितनी आत्मनिर्भरता।
समाज के बंधन में भी देखिए तो बहुत तरह से संशोधित सरकारी कानूनों के द्वारा वैसे नहीं हो सकता, जैसे समाज के एक-एक मनुष्य के अलग-अलग अपने संशोधन अपने