युवकों की प्रसुप्त शक्तियों का उपयोग किए बिना संकट टल नहीं सकता। जब कभी कोई आकस्मिक संकट आ जाता है अथवा समाज को नवीन दृष्टि की आवश्यकता होती है, तब युवकों की शक्ति भंडार का उपयोग करना ही पड़ता है। आज पुराने युग का अंत हो रहा है और हम एक नवीन युग में प्रवेश कर रहे हैं, सारे संसार का यही हाल है। यह संक्रमण काल है।
युद्ध के पश्चात जीवन के मूल्य सर्वत्र बदल रहे हैं। पुरानी संस्थाएं जीर्ण-शीर्ण हो रही है और उनके आधारभूत विचारों पर से लोगों की आस्था उठती जा रही है। समाज को नए आदर्श की आवश्यकता है जो उसका पथ प्रदर्शक हो। यों तो प्रत्येक समाज नवीन परिस्थिति के अनुकूल अपना आचरण और व्यवहार बदलने का प्रयत्न करता है, कि ं तु जब तक किसी महान उद्देश्य की गंभीर अनुभूति नहीं होती तब तक समाज में सामंजस्य और स्थिरता नहीं आती और उसकी समग्रता नष्ट होने लगती है।
इस नवीन दर्शन में नव युवकों की ही आस्था होती है। उन्होंने ही इस नवीन मूल्यों की सृष्टि की है और उन्हीं को उनके अनुसार जीवन व्यतीत करना है। 10th - - यही कारण है कि हम सर्वत्र देखते हैं कि नवयुवक समाज का नेतृत्व करने आगे आ रहे हैं। नव-समाज में, जिनका इतिहास पुराना नहीं है, नव युवकों का स्वागत होता है और वह शीघ्र ही अधिकार रूढ़ हो जाते हैं, कि ं तु पुरातन समाज में वृद्धों का वही पुराना स्थान अब भी चला आता है।
उनमें युवक के अधिकार स्वीकार नहीं किए जाते। इसलिए नव-युग के लाने में देर होती है। युवकों को अपनी कल्पना के बल से नई नीति बनाने का अवसर नहीं मिलता। अतः उनका असंतोष बढ़ता है और वह अपनी शक्तियों का उपयोग रचनात्मक कार्य में न कर, टीका टिप्पणी और आलोचना में ही उन्हें नष्ट कर देते हैं।
इससे समाज का अहित ही होता है। यह ठीक है कि पुरानी परम्परा की रक्षा के लिए वृद्धों का रहना भी आवश्यक है, किन्तु उनको यह स्वीकार करना चाहिए कि अब समय आ गया है जब उन्हें युवकों को जिम्मेदारी के पदों पर बैठाना चाहिए। युवकों का