अधिकार स्वीकार कर लिया जाए तो इसके कई लाभ है पहली बात तो यह समझने की है कि जो आज अधिकार रूॅढ हैं उनका कर्तव्य है कि वह अपने उत्तराधिकारियों को आज से तैयार करें अन्यथा इन वृद्धों के हट जाने पर उनकी जगह लेने वाले योग अनुभव व्यक्ति ना मिलेंगे दूसरी बात यह है कि भारत के स्वतंत्र होने पर जो बड़ी जिम्मेदारी देश पर आ गई है उसका भार सहन करने की शक्ति कुछ वृद्धों को छोड़कर अन्य वृद्धों में नहीं है पुनः नूतन समाज की रचना करने और प्रचलित सामाजिक पद्धति को तोड़ने की युवक में सामथ्र्थ है जो समाज नया उपक्रम करना चाहता है और किस को क्रांतिकारी परिवर्तन की आवश्यकता है उसको युवक का सहयोग अवश्य चाहिए और यह संयोग युवक के अधिकार को स्वीकार करना करके ही प्राप्त हो सकता है। स्वतंत्र राष्ट्र के विद्यार्थियों को हड़ताल करते हम नहीं सुनते।उनको इसकी आवश्यकता नहीं होती। परतंत्र राष्ट्र के विद्यार्थी राजनीतिक आंदोलन में खूब भाग लेते हैं उनको समय-समय पर प्रदर्शन और हड़ताल करनी पड़ती है, राजा के अधिकारियों के साथ संघर्ष होने से उनको गोली भी खानी पड़ती है। ऐसे वातावरण में रहने से उनकी एक विशेष प्रकार की मनोवृत्ति बन जाती है।
कि ं तु जब राष्ट्र स्वतंत्र हो जाता है, तब यही मनोवृत्ति हानिकारक सिद्ध होती है। राष्ट्र के संचालकों का कर्तव्य है कि बदलती हुई परिस्थिति में वह ऐसे विधान और उपायों का अविलंब लें जिनसे युवकों की मनोवृत्ति बदले और वह अपनी शक्तियों का विनियोग रचनात्मक कार्यों में करें। पहले तो पुराने अभ्यास को छोड़ना कठिन होता है और दूसरे जब समाज के नेता पुरानी वृत्ति को बदलने का प्रयास नहीं करते, तब कठिनाई और बढ़ जाती है। पुरानी मनोवृत्ति को बदलने का उपाय युवक के अधिकार को स्वीकार करना है।
यदि आज की पीढ़ी आने वाली पीढ़ी की शिक्षा-दीक्षा का भार अपने ऊपर न लोगी और उसे विकास का अवसर न देगी, तो वह इतिहास के सम्मुख दोषी ठहरायी जायेगी। राष्ट्र-निर्माण कार्य अभी आरंभ भी नहीं हुआ है। प्रत्येक दिशा में हमको प्रगति करनी है। शताब्दियों का रास्ता थोड़े वर्षों में तय करना है।
लोकतंत्र की स्थापना के लिए