आचार्य नरेन्द्र देव 10th - - कि ं तु जब समाज की ऐसी अवस्था हो जाती है कि उसको जीवित रहने के लिए अपनी पुरानी पद्धति को बदलने के लिए विवश होना पड़ता है तब उसके सामाजिक और आध्यात्मिक मूल्य भी बदलने लगते हैं। नूतन समाज के आरंभक प्रायः युवक ही होते हैं। कम से कम उनके सहयोग के बिना नूतन समाज की प्रतिष्ठा नहीं होती है। इसका कारण यह है कि युवक में साहस, शौर्य, तेज और त्याग की भावना प्रबल होती है।
वह अभी संसार के कीचड़ में नहीं फंसा है, इसलिए वह वस्तुस्थिति की अपेक्षा कर आदर्श के लिए आत्म-बलिदान करने के लिए उद्धत तो हो जाता है। इसका एक कारण यह भी है कि उसकी अभी कोई ऐसी दृष्टि नहीं बनी है जो उसको समाज की नवीन आवश्यकताओं को समझने से रोके। इसके विपरीत इन आवश्यकताओं का उसे विशेष अनुभव होता है। अतीत से नाता तोड़ने में उसे वह कठिनाई नहीं होती जो वृद्धों को होती है।
जिस समाज में ऐसी अवस्था उत्पन्न होती होने लगती है, वहाँ नए समाज का उपक्रम करने के लिए युवकों का आंदोलन प्रारंभ हो जाता है और युवक अपनी संस्थाएं बनाने लगते हैं। जब तक ऐसी अवस्था उत्पन्न नहीं हो जाती तब तक किसी समाज में युवक आंदोलन की सृष्टि नहीं होती। युवक आंदोलन का होना, न होना इस पर भी आश्रित है कि उस जाति विशेष का क्या स्वभाव है और समाज की परंपरा क्या रही है? यदि लोग समय से सुधार करने के अभ्यस्त हैं और संकट की अवस्था को टालना जानते हैं तो युवक आंदोलन कदाचित न भी हो; कि ं तु जो जाति क्रांति प्रिय है और जहाँ के समाज-नेता काफी दूरदर्शी नहीं है तथा अपने कट्टरपन के कारण समझौते के लिए तैयार नहीं हो जाते वहाँ युवक आंदोलन और संगठन का होना अनिवार्य हो जाता है।
साधारणतःसमाज को नव युवकों की प्रसुप्त शक्तियों का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वृद्ध होने पर वह पुरानी पीढ़ी का स्थान लेते हैं। कि ं तु जब किसी समाज के जीवन-मरण का प्रश्न उपस्थित हो जाता है जैसा कि युद्ध के समय होता है तब