‘द्विवेदी युग’ ( – ) के नाम से जाना जाता है. आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी लोभ बहुत बुरा है। वह मनुष्य का जीवन दुःखमय कर देता है क्योंकि अधिक धनी होने से कोई सुख नहीं होता है। धन देने से सुख मोल नहीं मिलता।
इसलिए जो मनुष्य सोने और चाँदी के ढेर को ही सब कुछ समझता है वह मूर्ख है। मूर्ख नहीं तो वह वृथा अहंकारी अवश्य है, जो बहुत धनवान है, वह यदि बुद्धिमान और बहुत योग्य भी होता तो हम धन ही को सब-कुछ समझते, परंतु ऐसा नहीं है। धनी मनुष्य सबसे अधिक बुद्धिमान नहीं होते। इसलिए धन को विशेष आदर की दृष्टि से देखना भूल है क्योंकि उससे सच्चा सुख नहीं मिलता।
इस देश के पहुँचे हुए विद्वानों ने धन को तुच्छ माना है। यह बात आजकल के समय के अनुकूल नहीं है। यूरोप और अमेरिका के ज्ञानी धन ही को बल, बल नहीं सर्वस्व समझते हैं परंतु जब धन के कारण अनेक अनर्थ होते हैं, उस धन को प्रधानता कैसे दी जा सकती है? और देशों में उसे भले ही प्रधानता दी जाए परंतु भारतवर्ष में उसे प्रधानता मिलना कठिन है।
जिस देश के निवासी संसार ही को माया में एक दुख का मूल कारण समझते हैं वे धन को कदापि सिक्का है तो नहीं मान सकते। बहुत धनवान होना व्यर्थ है उससे कोई लाभ नहीं, क्योंकि साधारण नृत्य पर खाने-पीने और पहनने आने के लिए जो धन काम आता है वही सफल है।उससे अधिक धन होने से कोई काम नहीं निकलता। स्वभाव अथवा प्रकृति के अनुसार ही खाने-पीने की आवश्यकताओं को दूर करने के लिए धन की चाह होती है। दूसरों को दिखलाने अथवा उसे स्वयं देखने के लिए धन इकट्ठा करने से कोई लाभ नहीं।
कोई जगत सेठ ही क्यों न हो यदि वह सितार या वीणा बजाना सीखना चाहेगा तो उसे उस विद्या को उसी तरह सीखना पड़ेगा जिस तरह एक निर्धन महाकंगाल को सीखना पड़ता है। उस गुण को प्राप्त करने में उसकी धनाढ्यता जरा भी काम न देगी। वह उसे मोल नहीं ले सकता, जब उसे धन के बल से वीणा बजाने के समान एक साधारण गुण भी नहीं मिल सकता। तब