ज्यों-ज्यों समय बीतता गया, उसका ध्यान भी कम होता गया। पर अब भी जब वे अपना बक्स खोलते हैं, तब कोई वस्तु देखकर चौंक पड़ते हैं और खास ही कोई पुराना दृश्य भी आँखों के सामने आ जाता है। घनश्याम अभी तक अविवाहित है। पहले तो उन्होंने निश्चय कर लिया था कि विवाह करेंगे ही नहीं।
पर मित्रों के कहने और स्वयं अपने अनुभव ने उनका यह विचार बदल दिया। अब वे विवाह करने पर तैयार हैं। परंतु अभी तक कोई कन्या उनकी रुचि के अनुसार नहीं मिली। जेठ का महीना है।
दिन भर की जला देने वाली धूप के पश्चात सूर्यास्त के समय अत्यन्त सुखमयी प्रतीत हो रहा है। इस समय घनश्याम दास अपनी कोठी के बाग़ में मित्रों सहित बैठे मंद-मंद शीतल वायु का आनंद ले रहे हैं। आपस में हास्य-रस पूर्ण बातें हो रही हैं। बातें करते-करते एक मित्र ने कहा- अजी, अभी तक अमरनाथ नहीं आये?
घनश्याम वह मनमौजी आदमी हैं। कहीं रम गया होगा। दूसरा नहीं रमा नहीं, वह आजकल तुम्हारे लिए वर ढूँढने की चि ं ता में रहता है। घनश्याम बड़े दिल्लगीबाज हो।
दूसरा नहीं, दिल्लगी की बात नहीं है। तीसरा हाँ, परसों मुझसे भी वह कहता था कि घनश्याम का विवाह हो जाए, तो मुझे चैन पड़े। ये बातें हो रही थी कि अमरनाथ लपकते हुए आ पहुँचे। घनश्याम आओ यार, बड़ी उमर।
अभी तुम्हारी ही बात हो रही थी। अमरनाथ इस समय बोलिये नहीं, एकाध को मार बैठूँगा। दूसरा जान पड़ता है कहीं से पिटकर आये हो। अमरनाथ तू फिर बोला, क्यों?
दूसरा क्यों बोल ना किसी के हाथ क्या बेच खाया है? अमरनाथ अच्छा, दिल्लगी छोड़ों। एक आवश्यक बात है। 10th - - सब उत्सुक होकर बोले –कहो कहो, क्या बात है?
अमरनाथ (घनश्याम से) तुम्हारे लिए दुल्हन ढूँढ ली है। सब (एक स्वर से) फिर क्या, तुम्हारी शादी है। अमरनाथ फिर वही दिल्लगी? यार, तुम लोग अजीब आदमी हो।
तीसरा अच्छा बताओ, कहाँ ढूँढा? अमरनाथ यहीं लखनऊ में। दूसरा लड़की का पिता क्या करता है? अमरनाथ पिता तो स्वर्गवास करता है।
तीसरा यह बुरी बात है। अमरनाथ लड़की है और उसकी माँ। बस तीसरा कोई नहीं।