विवाह में कुछ मिलेगा भी नहीं। लड़की की माता बड़ी गरीब है। दूसरा यह उससे भी बुरी बात है। तीसरा उल्लू मर गये, पट्ठे छोड़ गये।
घर भी ढूँढ़ा तो गरीब। कहाँ हमारे घनश्याम इतने धनाढ्य और कहाँ ससुराल इतनी दरिद्र। लोग क्या कहेंगे? अमरनाथ अरे भाई, कहने या ना कहने वाले हमी लोग हैं और यहाँ उनका कौन बैठा है जो कहेगा?
घनश्यामदास ने एक ठंडी सांस ली। तीसरा आपने क्या भलाई देखी, जो यह संबंध करना विचारा है? अमरनाथ लड़की की भलाई। लड़की लक्ष्मी रूपा है।
जैसी सुंदर वैसी ही सरल। ऐसी लड़की यदि दीपक लेकर ढूंढी जाए तो भी कदाचित ही मिले। दूसरा हाँ, यह अवश्य एक बात है। अमरनाथ परंतु लड़की की माता लड़का देखकर विवाह करने को कहती है।
तीसरा यह तो व्यवहार की बात है। घनश्याम और, मैं भी लड़की देखकर विवाह करूँगा। दूसरा यह भी ठीक है। 10th - - अमरनाथ तो इसके लिए क्या विचार है?
तीसरा विचार क्या, लड़की देखेंगे। अमरनाथ तो कब? घनश्याम - कल! ( ) दूसरे दिन शाम को घनश्याम और अमरनाथ गाड़ी पर सवार होकर लड़की देखने चले।
गाड़ी चक्कर खाती हुई दहिया गंज की एक गली के सामने जा खड़ी हुई। गाड़ी से उतरकर दोनों मित्र गली में घुसे। लगभग सौ कदम चलकर अमरनाथ एक छोटे से मकान के सामने खड़े हो गए और मकान का द्वार खटखटाया। घनश्याम बोले – मकान देखने से तो बड़े गरीब मान पड़ते हैं।
अमरनाथ – हाँ, बात तो ऐसी हाँ है। परंतु यदि लड़की तुम्हारी पसंद आ जाए, तो यह सब सहन किया जा सकता है। इतने में द्वार खुला और दोनों भीतर गये। संध्या हो जाने के कारण मकान में अँधेरा हो गया था।
अतएव ये लोग द्वार खोलने वाले को स्पष्ट न देख सके। एक दालान में पहुँचने पर ये दोनों चारपाइयों पर बिठा दिये गये और बिठाने वाली ने जो स्त्री थी, कहा- मैं जरा दिया जला लूँ। अमरनाथ - हाँ जला लो। स्त्री ने दीपक जलाया और पास ही एक दीवार पर उसे रख दिया।
फिर उनकी ओर मुख करके नीचे चटाई पर बैठ गयी। परंतु ज्यों ही उसने घनश्याम पर दृष्टि डाली-