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रामधारी सि ह ‘दिनकर’

Chapter 1: nºÉ´ÉÒÆ EòIÉÉ · Hindi · HI medium

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What does your textbook say about रामधारी सि ह ‘दिनकर’?

रामधारी सि ह ‘दिनकर’ पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, और प्रज्वलित-प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे? लहू गर्म रखने को रखो मन में ज्वलितविचार, हि स्त्र जीव से बचने को चाहिए कि तु तलवार । एक भेद है और, जहाँ निर्भय होते नर-नारी, कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चि गारी। जहाँ मनुष्य के भीतर हरदम जलते हैं शोले, बाँहों में बिजली होती, होते दिमाग में गोले। जहाँ लोग पालते लहू में हलाहल की धार, क्या चि ता यदि वहाँ हाथ पर हुई नहीं तलवार? कठिन शब्दार्थ :- तन-शरीर, भेद-फर्क, कलम-लेखनी,अंध-अंधकारयुक्त, बंद, प्रज्वलित-प्राण -दहकते हुए प्राण-शोले आग की लपटें, हलाहल-विष अभ्यास के लिए प्रश्न . श्रीरामधारी सि ह दिनकर का जन्म कब और कहाँ हुआ? . श्रीरामधारी सि ह दिनकर किन-किन पुस्तकों से प्रेरित हुए? .

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रामधारी सि ह ‘दिनकर’ पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे, और प्रज्वलित-प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे? लहू गर्म रखने को रखो मन में ज्वलितविचार, हि स्त्र जीव से बचने को चाहिए कि तु तलवार । एक भेद है और, जहाँ निर्भय होते नर-नारी, कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चि गारी। जहाँ मनुष्य के भीतर हरदम जलते हैं शोले, बाँहों में बिजली होती, होते दिमाग में गोले।

जहाँ लोग पालते लहू में हलाहल की धार, क्या चि ता यदि वहाँ हाथ पर हुई नहीं तलवार? कठिन शब्दार्थ :- तन-शरीर, भेद-फर्क, कलम-लेखनी,अंध-अंधकारयुक्त, बंद, प्रज्वलित-प्राण -दहकते हुए प्राण-शोले आग की लपटें, हलाहल-विष अभ्यास के लिए प्रश्न . श्रीरामधारी सि ह दिनकर का जन्म कब और कहाँ हुआ? .

श्रीरामधारी सि ह दिनकर किन-किन पुस्तकों से प्रेरित हुए? . श्रीरामधारी सि ह की प्रमुख रचनाओं का नाम लिखिए। .

‘कलम और तलवार’ की विशेषता कवि ने किस प्रकार जिक्र किया है? . ‘कलम और तलवार’ के बारे में कवि का विचार क्या है? .

कलम और तलवार का अंतर स्पष्ट कीजिए। I) सप्रसंग व्याख्या कीजिए। दो में से................ ................बाहर जा मैदान?

.एक भेद है............... .....................दिमाग में गोले. II)‘कलम और तलवार’कविताकासारांशलिखिए। माखनलाल चतुर्वेदी जी का जन्म होशंगाबाद जिले (मध्यप्रदेश) के बावई नामक गाँव में हुआ था।

चतुर्वेदी कवि ही नहीं सफल पत्रकार, गद्यकार, और नाटककार भी थे। आपके काव्य-संग्रहों में माता, युग-चरण, समर्पण, मरण- ज्वर आदि बहुप्रशंसित हैं। कवि की सभी रचनाएँ खड़ी बोली हिन्दी में हैं। आपका काव्य-साहित्य, देश-भक्ति, मानव-प्रेम और आध्यात्मिकता का त्रिवेणी संगम है।

माखनलाल चतुर्वेदी शासन की विधि पूरी करने एक बात है, शासन की कला का ज्ञान होना और बात। कला के ज्ञाता में व्यक्ति (पर्सनैलिटी) होती है, विधि को पूरा करनेवाला इसकी ओर बहुत कम लक्ष्य देता है। कला कुछ व्यक्तियों का ही नहीं, कुछ जातियों तक का स्वभाव हो जाता है। प्रत्येक व्यक्ति में जीवन के कम-से-कम दो हिस्से रहते हैं – एक तो उसका कार्य, जिसकी ज़िम्मेदारी वह कुली की तरह निबाहने के लिए बाध्य है और दूसरे उसका अपना व्यक्तित्व, जो उसके एक या अनेक कार्यों में चमक चढ़ाता है।

दूसरे रूप में मनुष्य दो स्वरूपों में विश्व के सामने खड़ा है, एक तो उसका व्यक्तित्व, उसके कार्यों और उसकी जिम्मेदारियों को वह अपना कहकर विश्व के सम्मुख अपने को खुला- उघाड़ा, बे-पर्द छोड़ने को बाध्य होता है और दूसरे वह व्यक्ति खुद जो केले के भीतरी स्तंभ की तरह व्यक्तित्व के एक या अनेक पर्दों की तह में उज्जवल या निरूज्ज्वल बनकर छिपा रहता है। व्यक्तित्व कहते हैं उस वस्तु को जो मनुष्य के बाहरी और भीतरी जीवन में संबंध स्थापित रखती और उन दोनों विभाजित जीवन के हिस्सों को एक-दूसरे का जीवन-रस पान कराने का अवसर देती है। व्यक्तित्व बाहर अपने आप प्रकट होता है और भीतर संपूर्ण जीवन को संगठित किया करता है व्यक्तित्व के योग दर्शन उस व्यक्ति के पास हो सकेंगे जो अपने अंतरतम से बहुत दूरी पर खड़ा नहीं होता, न जो अपने अंतरतम की उपेक्षा करता है।न जो अपने अंतरतम का अपनी क्रूरता पूरी करने के लिए सौदा करता है व्यक्तित्व बहुत शीघ्र पकड़ा जा सकता है अकड़ और आडंबर का नाम व्यक्तित्व नहीं है व्यक्तित्व की आंखें हमें न्योता देकर बुलाती हैं उसमें हमें बेबस प्यार प्रेम और विश्वास भी होने लगता है जिसमें व्यक्तित्व का प्रभाव होगा उसकी ओर हमारी तवज्जो ही नहीं होगी, और अपनी ओर हमारा ध्यान खींचने के लिए प्रचार या षड्यंत्र रामधारी सि ह ‘दिनकर’ और महल बना कर नहीं रहते थे।फूस की झोपड़ियों में वास करना, जंगल के जीवन से दोस्ती और प्यार करना, किसी भी मोटे काम को अपने हाथ से करने में हिचकिचाहट नहीं दिखती,पत्तों में खाना और मिट्टी के बर्तनों में रसोई पकाना, यही उनकी जि दगी थी यह लक्षण आज की यूरोपीय परिभाषा के अनुसार के लक्षण नहीं माने जाते है।,फिर भी वे ऋषिगण सुसंस्कृत ही नहीं थे बल्कि वह हमारी जाति की संस्कृति का निर्माण करते थे। सभ्यता और संस्कृति में यह एक मौलिक भेद है, जिसे समझे बिना हमें कहीं-कहीं कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है।

मगर, यह कठिनाई कहीं-कहीं ही आती है।साधारण नियम यही है कि संस्कृति की सभ्यता की प्रगति, अधिकतर एक साथ होती है और दोनों का एक दूसरे पर प्रभाव भी पड़ता रहता है।उदाहरण के लिए जब हम कोई घर बनाने लगते हैं, तब स्थूल रूप से यह सभ्यता का कार्य होता है। मगर, हम घर का कौन-सा नक्शा पसंद करते हैं, इसका निर्णय हमारी संस्कृति की रुचि करती है और संस्कृति की प्रेरणा से हम जैसा घर बनाते हैं, वह सिर्फ सभ्यता का अंग बन जाता है। इस प्रकार सभ्यता का संस्कृति पर और संस्कृति का सभ्यता पर पड़ने वाले प्रभाव का क्रम निरंतर चलता ही रहता है। यही एक बात यह भी समझ लेनी चाहिए की संस्कृति और प्रकृति में भी भेद है।

गुस्सा करना मनुष्य की प्रकृति है, लोभ में पड़ना उसका स्वभाव है, ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष और कामवासना ये सब-के-सब प्रकृति प्रदत्त गुण हैं मगर, प्रकृति के ये गुण बेरोक छोड़ दिए जाएँ तो आदमी और जानवर में कोई भेद नहीं रह जाएगा। इसलिए, मनुष्य प्रकृति के इन आवेगों पर रोक लगाता है और कोशिश करता है कि वह गुस्से के बस में नहीं बल्कि गुस्सा ही उसके बस में रहे; वह ईर्ष्या, मोह, राग, द्वेष और कामवासना का गुलाम नहीं रहे,बल्कि, ये दुर्गुण उसके गुलाम रहें और इन दुर्गुणों पर आदमी जितना विजयी होता है, उसकी संस्कृति भी उतनी ही ऊंची समझी जाती है। निष्कर्ष यह है कि संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है। यह सभ्यता के भीतर उसी तरह व्याप्त रहती है जैसे दूध में मक्खन या फूलों में सुगंध और सभ्यता की अपेक्षा यह टिकाऊ भी अधिक है,क्योंकि सभ्यता की सामग्रियां फूट-फूटकर विनष्ट हो जा सकती हैं, लेकिन, संस्कृति का विनाश इतनी आसानी से नहीं किया जा सकता।

एक बात और है किस सभ्यता के उपकरण जल्दी से बटोरे भी जा सकते हैं, मगर, उनके उपयोग के लिए संस्कृति चाहिए, वह तुरंत नहीं आ सकती जो आदमी अचानक धनी हो जाता है या एक-ब-एक किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाता है, उसे चिढ़ाने के लिए अंग्रेजी में एक शब्द ‘अपस्टार्ट’ है। ‘अपस्टार्ट’को लोग बुरा समझते हैं और इसलिए बुरा नहीं समझते कि अचानक धनी हो जाना या एक-ब-एक किसी ऊंचे पद पर पहुंच जाना कोई बुरी बात है, वरन, इसलिए की धनियों तथा ऊंचे ओहदेवालों की जो संस्कृति है, वह तुरंत सीखी नहीं जा सकती। इसलिए ऊंचे ओहदे पर पहुँचा हुआ व्यक्ति यदि पहले से अधिक विनयशील नहीं हो जाए,तो वह चिढ़ाने लायक हो जाता है। संस्कृति ऐसी चीज नहीं है जिसकी रचना दस, बीस या सौ, पचास-वर्षों में की जा सकती हो।अनेक शताब्दियों तक एक समाज के लोग जिस तरह खाते- पीते, रहते-सहते, पढ़ते-लिखते, सोचते-समझते, और राजकाज चलाते अथवा धर्म-कर्म करते हैं उन सभी कार्यों से उनकी संस्कृति उत्पन्न होती है।

हम जो भी करते हैं उसमें हमारी संस्कृति की झलक होती है।यहाँ तक कि हमारे उठने-बैठने, पहनने-ओढ़ने, घूमने-फिरने, और रोने-हंसने से भी हमारी संस्कृति की पहचान होती है,यद्यपि हमारा कोई भी एक काम हमारी संस्कृति का पर्याय नहीं बन सकता। असल में, संस्कृति जि दगी का एक तरीका है और यह तरीका सदियों से जमा होकर उस समाज में छाया रहता है, जिसमें हम जन्म लेते हैं। इसलिए जिस समाज में हम पैदा हुए हैं अथवा जिस समाज से मिलकर हम जी रहे हैं उसकी संस्कृति हमारी संस्कृति है, यद्यपि अपने जीवन में हम जो भी संस्कार जमा करते हैं वह भी हमारी संस्कृति का अंग बन जाता है और मरने के बाद हम अन्य वस्तुओं के साथ अपनी संस्कृति की विरासत भी अपनी संतानों के लिए छोड़ देते हैं। इसलिए, संस्कृति वह चीज मानी जाती है जो हमारे सारे जीवन को व्यापे हुए हैं तथा जिसकी रचना और विकास में अनेक सदियों के अनुभवों का हाथ है बल्कि संस्कृति हमारा पीछा जन्म जन्मांतर तक करती है।

अपने यहां एक साधारण कहावत है जिसका जैसा संस्कार है उसका वैसा ही पुनर्जन्म भी होता है। जबहम किसी बालक या बालिका को बहुत तेज पाते हैं तब हम अचानक ही कह उठते हैं कि यह पूर्व जन्म का संस्कार है। संस्कार या संस्कृति असल में शरीर का नहीं आत्मा का गुण है और जब की सभ्यता की सामग्रियों से हमारा संबंध शरीर के साथ ही छूट जाता है तब भी हमारी संस्कृति का प्रभाव हमारी आत्मा के साथ जन्म-जन्मांतर तक चलता रहता है। आदिकाल से हमारे लिए जो लोग काव्य और दर्शन रचने आए हैं, चित्र और मूर्ति बनाते आए हैं, वह हमारी संस्कृति के रचयिता है।

आदिकाल से हम जिस-जिस रूप में शासन चलाते आए हैं, पूजा करते आए हैं, मंदिर और मकान बनाते आए हैं, नाटक और अभिनय करते आए हैं,बर्तन और घर के दूसरे सामान बनाते आए हैं, कपड़े और जेवर पहनते आए हैं, पर्व और त्योहार मनाते आए हैं, परिवार पड़ोसी और संसार से दोस्ती या दुश्मनी का जो भी सलूक करते आए हैं, सब-का-सब हमारी संस्कृति का ही अंश है। संस्कृति के उपकरण हमारे पुस्तकालय और संग्रहालय म्यूजियम नाटक शाला और सिनेमा गृह ही नहीं बल्कि हमारे राजनीतिक और आर्थिक संगठन भी होते हैं, क्योंकि उन पर भी हमारी रुचि और चरित्र की छाप लगी होती है। संस्कृति का स्वभाव है कि वह आदान-प्रदान से बढ़ती है। जब भी दो देश वाणिज्य-व्यापार अथवा शत्रुता या मित्रता के कारण आपस में मिलते हैं तब उनकी संस्कृतियां एक-दूसरे को प्रभावित करने लगती हैं, ठीक उसी प्रकार, जैसे दो व्यक्तियों की संगति का प्रभाव दोनों पर पड़ता है।

संसार में शायद ही कोई ऐसा देश हो जो यह दावा कर सके कि उस पर किसी अन्य देश की संस्कृति का प्रभाव नहीं पड़ा है। इसी प्रकार, कोई जाति भी यह नहीं जान सकती कि उस पर किसी दूसरी जाति का प्रभाव नहीं है। जो जाति केवल देना ही है, जानती है लेना कुछ नहीं, उसकी संस्कृति का एक-न-एक दिन दिवाला निकल जाता है। इसके विपरीत, जिस जलाशय के पानी लाने वाले दरवाजे बराबर खुले रहते हैं उसकी संस्कृति कभी नहीं सूखती।

उसमें सदा ही स्वच्छ जल लहराता और कमल के फूल खिलते रहते हैं। कूपमण्डूकता और दुनिया से रूठ कर अलग बैठने का भाव संस्कृति को ले उठता है। अकसर देखा जाता है कि जब हम एक भाषा में किसी अद्भुत कला को विकसित होते देखते हैं तब तुरंत आसपास पड़ोस या संपर्क वाली दूसरी भाषा में हम उसके उत्स की खोज करने लगते हैं।पहले भाषा में ‘शैली’ और ‘कीड्स’ पैदा होते हैं, तब दूसरी भाषा में ‘रवींद्र’ उत्पन्न होते हैं। पहले एक देश में ‘बुद्ध’ पैदा होते हैं।

देश में यीशु मसीह का जन्म होता है। मगर मुसलमान इस देश में नहीं आए होते तो ऊर्दु भाषा का जन्म नहीं होता और ना मोगल-कलम की चित्रकारी ही यहाँ पैदा हुई होती। अगर यूरोप से भारत का संपर्क नहीं हुआ होता तो भारत की विचारधारा पर विज्ञान का प्रभाव देर से पढ़ता और राम मोहनराय, दयानंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, गांधी में से कोई भी सुधारक उस समय जन्म नहीं लेते, जिस समय उनका जन्म हुआ। जब भी दो जातियाँ मिलते हैं उनके संपर्क एवं संघर्ष से जि दगी की एक नई धारा फूट निकलती है, इसका प्रभाव दोनों पर पड़ता है।आदान-प्रदान की प्रक्रिया संस्कृति की जान है और इसी के सहारे वह अपनेकोजि दा रखती है।

केवल चित्र, कविता, मूर्ति, मकान और पोशाक पर ही नहीं, सांस्कृतिक संपर्क का प्रभाव दर्शन और विचार पर भी पड़ता है।एक देश में जो दार्शनिक और महात्मा उत्पन्न होते हैं, उनकी आवाज दूसरे देशों में भी मिलते-जुलते दार्शनिकों और महात्माओं को जन्म देती है। एक देश में जो धर्म खड़ा होता है, वह दूसरे देशों के धर्मों को भी बहुत कुछ बदल देता है। यही नहीं बल्कि प्राचीन जगत में तो बहुत से ऐसे देवी देवता भी मिलते हैं जो कई जातियों के संस्कारों से निकल कर एक जगह जमा हुए हैं।एक जाति का धार्मिक रिवाज दूसरी जाति का रिवाज बन जाता है और एक देश की आदत दूसरे देश के लोगों की आदत में समा जाती है।अतएव, सांस्कृतिक दृष्टि से वह देश और वह जाति अधिक शक्तिशाली और महान समझी जानी चाहिए, जिसने विश्व के अधिक से अधिक देशों अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियों को अपने भीतर जज्ब करके उन्हें पचा करके, बड़े-से-बड़े समन्वय को उत्पन्न किया है।भारत देश और भारतीय जाति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है क्योंकि यहाँ की सामासिक संस्कृति में अधिक से अधिक जातियों की शक्तियां पची हुई है। संस्कृति क्या है?

के प्रश्न . रामधारी सिंह दिनकर ने संस्कृति के बे में क्या कहा हैं? . जीवन में संस्कृति के बारे में लिखिए।

. संस्कृति और सभ्यता पर टिप्पणी लिखिए। . संस्कृति किसे कहते हैं उसका लक्षण क्या है?

. संस्कृति का प्रभाव किन-किन बातों पर पड़ता है? . संस्कृति और सभ्यता सिक्के के दो पहलू हैं?

समझाइये। . संस्कृति पाठ का सारांश लिखिए। II) सही या गलत चुनकर लिखिए .

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के बाद राष्ट्रकवि के रूप में दिनकर का नाम लिया जाता है । . सभ्यता वह चीज है,जो हमारे पास है । .

फूस की झोपड़ियों में वास करना, पत्तों में खाना और मिट्टी के बर्तनों में रसोई पकाना, ही जिंदगी थी । . संस्कृति की सभ्यता की प्रगति, अधिकतर एक साथ होती है । .

संस्कृति सभ्यता की अपेक्षा महीन चीज होती है। III) खाली जगह भरिए संस्कृति से बढ़ती है। . हमारे राजनीतिक और भी होते हैं ।

. एक जाति का दूसरी जाति का रिवाज बन जाता है । . में अधि क से अधिक जातियों की शक्तियां पची हुई है।

आधुनिक मनीषियों में आचार्य नरेन्द्र देव का स्थान महत्वपूर्ण है। यद्यपि वे कांग्रेस से जुड़े हुए तथापि कांग्रेस के अंतर्गत जो समाजवादी विचारों का मंच था उसमें आचार्य नरेन्द्र देव का वैचारिक योगदान एवं मार्गदर्शन महनीय माना जाता है। व अपने विचारों की मौलिकता, चि तन की गंभीरता एवं कथन की स्पष्टता के कारण बुद्धिजीवियों के बीच अधिक चर्चित रहे। विभिन्न विश्वविद्यालयों में उन्होंने आचार्य पद पर काम किया और लखनऊ तथा अन्य दो विश्वविद्यालयों में इन्होंने उपकुलपति का कार्यभार भी सफलता से सँभाला।

इसके साथ ही साथ राजनीति के क्षेत्र में उन्होंने समाजवाद को जो सैद्धांतिक रूप दिया उसके कारण भी उनको लोग याद करते रहेंगे। आचार्य नरेन्द्र देव उपर्युक्त विविध क्षेत्रों में काम करते समय भारतीय समाज की जो त्रुटियाँ उन्हें दिखाई पड़ी थीं, वर्तमान पीढ़ी की अनुत्तरदायित्वपूर्ण नीति के संबंध में विचार करने पर उन्होंने जो कुछ अनुभव किया था उसे युवकों का समाज में स्थान शीर्षक निबंध में व्यक्त किया है तथा स्पष्ट शब्दों में यह घोषित किया है कि जब तक पुरानी पीढ़ी युवकों को असमर्थ, अविश्वसनीय, अनुत्तरदायी और नालायक समझती रहेगी तब तक समाज में आदर्श अथवा अभीष्ट की स्थापना नहीं हो सकती। लेखक ने युवकों को भी एक मर्यादा अथवा संहिता के अंदर रखने का प्रयास किया है। तथा उनकी शक्ति, साहस, तेज आदि से उन्हें परिचित कराया है।

संक्षेप में प्रस्तुत निबंध के माध्यम से आचार्य जी ने जो कुछ कहा है वह आज के युवाओं और बूढ़ों, दोनों की दृष्टि से पठनीय है तथा विचारणीय भी है। सामान्यतः उन समाजों में, जहाँ स्थिरता आ गई है और जहाँ विकास की गति अत्यंत मंद है, वृद्धों की सबसे अधिक प्रतिष्ठा होती है। ऐसे समाज में वृद्धों का ही नेतृत्व होता है और उनका अनुभव ही समाज का मुख्य आधार होता है। चीन और भारत के समाज इसके उदाहरण हैं।

हमारे पूर्वजों का कहना है कि वह सभा ही नहीं जहाँ वृद्ध नहीं है। ऐसे समाज की शिक्षा प्रणाली में लोक परंपरा का बड़ा महत्व होता है। वहां शिक्षा के नए प्रकारों की परख का प्रश्न ही नहीं उठता जिनकी संस्कृति और जिनका इतिहास प्राचीन है, उनकी यही कथा है। जब तक समाज के आधारभूत मौलिक सिद्धांतों के परिवर्तन का प्रश्न नहीं उठता और जब तक समाज के आर्थिक ढांचे में क्रांतिकारी परिवर्तन नहीं होता तब तक यही अवस्था बनी रहती है।

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