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विष्णु प्रभाकर · Part 3

Chapter 14: विष्णु प्रभाकर · Hindi

कुरसी पर बैठ जाते हैं।) पिता : वैद्य जी, शाम तक ठीक था। दफ्तर चलते वक्त रास्ते में एकदम बोला – मेरे पेट में दर्द होता है। ऐसे-ऐसे होता है। समझ नहीं आता, यह कैसा दर्द है।

वैद्य जी : अभी बता देता हूँ। असल में बच्चा है। समझ नहीं पाता है( नाड़ी दबाकर) वात का प्रकोप है....मैंने कहा, बेटा जीभ तो दिखाओ। (मोहन जीभ निकालता है) कब्ज है।

पेट साफ नहीं है। मल रुक जाने से वायु बढ़ गई है। क्यों बेटा हाथ ऐसे-ऐसे होता है। मोहन : (कराहकर) जी हाँ....ओह।

वैद्य जी : (हर्ष से उछलकर) मैंने कहा न, मैं समझ गया। अ पुड़िया भेजता हूँ। मामूली बात है, पर यही मामूली बात कभी-कभी बड़ों-बड़ों को छका देती है। समझने की बात है।

मैंने कहा, आओ जी, दीनानाथ जी आप ही पुड़िया ले लो। (मोहन की माँ से) आधे-आधे घंटे बाद गरम पानी से देती है। दो-तीन दस्त होंगे। बस फिर ‘ऐसे-ऐसे’ ऐसे भागेगा जैसे गधे के सिर से सींग।

(वैद्य जी द्वार की ओर बढ़ते हैं। मोहन के पिता पाँच का नोट निकालते हैं।) पिता : वैद्य जी, यह आपकी भेंट (नोट देते हैं) वैद्य जी : (नोट लेते हैं) अरे मैंने कहा, आप यह क्या करते हैं? आप और हम क्या दे हैं? (अंदर के दरवाज़े से जाते हैं।

तभी डॉक्टर प्रवेश करते हैं।) डॉक्टर : हैलो, मोहन! क्या बात है?‘ऐसे-ऐसे’ क्या कर लिया? (माँ और पिताजी फिर उठते हैं। मोहन कराहता है डॉक्टर पास बैठते हैं।) पिता : डॉक्टर साहब, कुछ समझ में नहीं आता।

डॉक्टर : (पेट दबाने लगते हैं।) अभी देखता हूँ। जीभ तो दिखाओ बेटा। (मोहन जीभ निकालता है) हूँ, तो मिस्टर, आपके पेट में कैसे होता है। ऐसे-ऐसे (मोहन बोलता नहीं, कराहता है।) बताओ, बेटा डॉक्टर साहब को समझा दो।

मोहन : जी....जी....ऐसे-ऐसे कुछ ऐसे-ऐसे होता है। (हाथ से बताता है। उँगलियाँ भींचता है) डॉक्टर, तबीयत तो बड़ी खराब है। 10th - - डॉक्टर : (सहसा गंभीर होकर) वह तो मैं देख रहा हूँ।

चेहरा बताता है, इसे काफी दर्द है। असल में कई तरह के दर्द चल रहे हैं। कौलिक पेन तो है नहीं। और फोड़ा भी

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