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विष्णु प्रभाकर · Part 5

Chapter 14: विष्णु प्रभाकर · Hindi

और डॉक्टर को पास नहीं है। इसकी ‘ऐसे-ऐसे’ की बीमारी को मैं जानता हूँ। अकसर मोहन जैसे लड़कों को वह हो जाती है। माँ : सच क्या बीमारी है यह?

मास्टर : अभी बताता हूँ। (मोहन से) अच्छा साहब। दर्द तो दूर हो ही जाएगा। डरो मत।

बेशक कल स्कूल मत आना। पर हाँ, एक बात तो बताओ, स्कूल का काम तो पूरा कर लिया है? (मोहन चुप रहता है) माँ : जवाब दो, बेटा, मास्टर जी क्या पूछते हैं। मास्टर : हाँ बोलो, बेटा।

(मोहन कुछ देर फिर मौन रहता है। फिर इनकार में सिर हिलाता है।) मोहन : जी, सब नहीं हुआ। मास्टर : हूँ. शायद सवाल रह गये हैं।

मोहन : जी! मास्टर : तो यह बात है। ऐसे-ऐसे काम न करने का डर है। माँ : (चौंककर) क्या?

(मोहन सहसा मुंह छिपा लेता है) मास्टर : (हंसकर) कुछ नहीं, माता जी मोहन ने महीना भर मौज की। स्कूल का काम रह गया। आज खयाल आया। बस डर के मारे पेट में ‘ऐसे-ऐसे’ होने लगा।

‘ऐसे-ऐसे’! अच्छा, उठिए साहब। आपके ‘ऐसे-ऐसे’ की दवा मेरे पास है। स्कूल से आपको दो दिन की छुट्टी मिलेगी।

आप उसमें काम पूरा करेंगे और आपका ‘ऐसे-ऐसे’ दूर भाग जाएगा। (मोहन उसी तरह मुंह छिपाए रहता है) अब उठकर सवाल शुरू कीजिए। उठिए, खाना मिलेगा ( मोहन उठता है माँ ठगी-सी देखती है। दूसरी ओर से पिता और दीनानाथ दवा लेकर प्रवेश करते हैं।) 10th - - माँ : क्यों रे मोहन, तेरे पेट में तो बहुत बड़ी दाढ़ी है।

हमारी तो जान निकल गई। पन्द्रह-बीस रुपये खर्च हुए, सो अलग। (पिता से) देखा जी आपने। पिता : (चकित होकर) क्या-क्या हुआ?

माँ : क्या-क्या होता। यह ‘ऐसे-ऐसे’ पेट का दर्द नहीं है, स्कूल का काम न करने का डर है। पिता : हें! दवा की शीशी हाथ से छूटकर फर्श पर गिर पड़ती है।

एक क्षण सब ठगे-से मोहन को देखते हैं। फिर हँस पड़ते हैं। दीनानाथ : वाह, मोहन, वाह!पिता : वाह, बेटा वाह! तुमने तो खूब छकाया।

पिता : वाह, बेटा वाह! तुमने तो खूब छकाया। (एक अट्टहास के बाद पर्दा गिर जाता है। प्रश्नोत्तर .

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