मिलता है। संतोष न होने से कभी सुख नहीं मिलता। किसी न किसी वस्तु की सदैव कमी बनी ही रहती है। लोभी मनुष्य को चाहे त्रिलोक की संपत्ति मिल जाए तो भी उसे और संपत्ति पाने की इच्छा बनी ही रहेगी।
लोभ एक तरह की बीमारी है परंतु है बड़ी सख्त बीमारी। सख्त इसीलिए कि वह अपने को बढ़ाने का यत्न करती है घटाने का नहीं। जो मनुष्य भूखा होता है वह भोजन करता है, भोजन छोड़ नहीं देगा। परंतु लोभी का प्रकार उल्टा है उसे द्रव्य की भूख रहती है परंतु जब वह उसे मिल जाता है तब उसे वह काम में नहीं लाता, रख छोड़ता है और अधिक धन पाने के लिए दौड़-धूप करने लगता है।
लोभी मनुष्य बहुधा इसीलिए धन इकट्ठा करता है जिसमें उसे किसी समय उसकी कमी ना पड़े परंतु उसे कमी हमेशा ही बनी रहती है पहले उसकी कमी कल्पित होती है परंतु पीछे से वह यथार्थ असली हो जाती है क्योंकि घर में धन होने पर भी वह काम में नहीं ला सकता है लोभ से असंतोष की वृद्धि होती है और संतोष का सुख खाक में मिल जाता है लोभ से भूख बढ़ती है और तृप्ति घटती है लोभो से मूल धन व्यस्त भरता है और उसका उपयोग कम होता है लोभी का धन देखने के लिए व्यथा रक्षा करने के लिए और दूसरों को छोड़ जाने के लिए है ऐसे धन से क्या लाभ ऐसे धन को 10th - - इकट्ठा करने में अनेक कष्ट उठाने की अपेक्षा संसार भर में कितना धन है उसे अपना ही समझना अच्छा है लोभी का धन उसके काम तो आता नहीं इसलिए उसे दूसरे का धन मन ही मन अपना समझने में कोई हानि नहीं उससे उल्टा लाभ है क्योंकि उसे प्राप्त करने के लिए परिश्रम नहीं करना पड़ता लोगों को हंसाने के संतरी समझना चाहिए लोभी मनुष्य जब तक जीते हैं तब तक संतरी सामान अपने धन की रखवाली करते हैं और मरने पर उसे दूसरों के लिए छोड़ जाते हैं। कोई लोभी अपने पीछे अपने लड़कों के काम आने के लिए धन इकट्ठा करते हैं उनको यह समझ नहीं