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रक्षा बंधन · Part 2

Chapter 22: रक्षा बंधन · Hindi

का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की चेष्टा कर रही थी। परंतु जब उसे इसमें सफलता नहीं होती, तब उनकी उदासी बढ़ जाती है। इसी प्रकार एक, दो, तीन करके कई पुरुष बिना उसकी ओर देखे निकल गये। अंत में बालिका निराश होकर घर के भीतर लौट जाने को उद्यत हुई थी कि एक सुंदर युवक की दृष्टि जो कुछ सोचता हुआ धीरे-धीरे जा रहा था, बालिका पर पड़ी।

बालिका की आँखें युवक की आँखों से जा लगी। न जाने उन उदास तथा करुणा-पूर्ण नेत्रों में क्या जादू भरा था कि युवक ठिठककर खड़ा हो गया और बड़े ध्यान से पैर तक देखने लगा। ध्यान से देखने पर युवक को ज्ञान हुआ कि बालिका की आँखें अश्रुपूर्ण हैं। तब वह अधीर हो गया।

निकट जाकर पूछा-बेटी, क्यों रोती हो? बालिका इसका कुछ उत्तर न दे सकी। परंतु उसने अपना एक हाथ युवक की ओर बढ़ा दिया। युवक ने देखा, बालिका के हाथ में एक लाल डोरा है।

उसने पूछा-यह क्या है? बालिका ने आँखें नीची करके उत्तर दिया-राखी। युवक समझ गया। उसने मुस्कुराकर अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया।

बालिका का मुख-कमल खिल उठा। उसने बड़े चाव से युवक के हाथ में राखी बाँध दी। राखी बंधवा चुकने पर युवक ने जेब में हाथ डाला और दो रुपये निकालकर बालिका को देने लगा। परंतु बालिका ने उन्हें लेना स्वीकार न किया।

बोली-नहीं, पैसे दो। युवक ये पैसे से भी अच्छे है। बालिका नहीं, मैं पैसे लूँगी, यह नहीं। युवक ले लो बिटिया।

इसके पैसे मँगा लेना। बहुत से मिलेंगे। 10th - - बालिका नहीं, पैसे दो। युवक ने चार आने पैसे निकालकर कहा - अच्छा, ले पैस भी ले और यह भी ले।

बालिका नहीं खाली पैसे लूँगी। तुझे दोनों लेने पड़ेंगे। यह कहकर युवक ने बलपूर्वक पैसे तथा रुपये बालिका के हाथ पर रख दिये। इतने में घर के भीतर से किसने पुकारा अरी सरखुनी कहाँ गयी?

बालिका ने आयी कहकर युवक की ओर कृतज्ञतापूर्ण दृष्टि डाली और चली गयी। गीलागंज (लखनऊ) की एक बड़ी तथा सुंदर अट्लिका के एक सुसज्जित कमरे में एक युवक चिन्ता-सागर में निमग्न बैठा है। तभी वह ठंडी साँस भरता है,

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