कभी रुमाल से आँखें पोंछता है, कभी आप ही आप कहता है, हाँ, सारा परिश्रम व्यर्थ गया। सारी चेष्टाएँ निष्फल हुईं। क्या करूँ? कहाँ जाऊँ?
उन्हें कहाँ ढूंढ़ूँ? सारा उन्नाव छान डाला, परंतु फिर भी पता न लगा। युवक आगे कुछ और कहने को था कि कमरे का द्वार धीरे-धीरे खुला और एक नौकर अंदर आया। युवक ने कुछ विखत होकर पूछा, क्यों, क्यों है?
नौकर सरकार, अमरनाथ बाबू आये हैं। युवक (संभलकर) अच्छा, यहीं भेज दो। नौकर के जाने के बाद युवक ने रुमाल से आँखें पोंछ डाली और मुख पर गंभीरता लेने की चेष्टा करने लगा। द्वार फिर खुला और एक युवक अंदर आया।
युवक आओ भाई , अमरनाथ! अमरनाथ कहो घनश्याम, आज अकेले कैसे बैठे हो? कानपुर से कब लौटे? घनश्याम कल आया था।
अमरनाथ उन्नाव ही अवश्य उतरे होगे? घनश्याम (एक ठंडी साँस भरकर) हाँ, उतरा था। परंतु व्यर्थ। वहाँ अब मेरा क्या रखा है?
10th - - अमरनाथ परंतु करने क्या? हृदय नहीं मानता, क्यों? यदि तुम्हारे स्थान पर मैं होता, तो मैं भी ऐसा ही करता। घनश्याम क्या कहूँ मित्र, मैं तो हार गया।
तुम तो जानते ही हो कि मुझे लखनऊ आकर रहे एक वर्ष हो गया और जब से यहाँ आया हूँ उन्हें ढूंढने में कुछ भी कसर उठा नहीं रखी, परंतु सब व्यर्थ। अमरनाथ उन्होंने उन्नाव न जान क्यों छोड़ दिया और कब छोड़ा इसका भी कोई पता नहीं चलना। घनश्याम इसका तो पता चल गया न कि वे लोग मेरे चले जाने के एक वर्ष पश्चात उन्नाव से चले गये। परंतु कहाँ गये, यह नहीं मालूम।
अमरनाथ यह किससे मालूम हुआ? घनश्याम उसी मकानवाले से, जिसके मकान में हम लोग रहते थे। अमरनाथ हाँ शोक। घनश्याम कुछ नहीं, यह सब मेरे ही कर्मों का फल है।
यदि मैं उन्हें छोड़कर न जाता, यदि गया था, तो भी उनकी खोज-खबर लेता रहता। परंतु मैं तो दक्षिण जाकर रुपया कमाने में इतना व्यस्त रहा कि कभी याद ही न आया। और जो आई भी तो क्षण मात्र के लिए। उफ, कोई भी अपने घर को भूल जाता है?
मैं ही ऐसा अधम....... अमरनाथ (बात काटकर) अजी नहीं, सब समय