रक्षा बंधन विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक 10th - - उत्तर में माता ने एक ठंडी साँस भरी और कहा – किसको बांधेगी बेटी, आज तेरा भाई होता तो...... माता आगे कुछ न कह सकीं। उसका गला रूँध गया, नैन अश्रुपूर्ण हो गये। अबोध बालिका ने इठलाकर कहा-तो क्या भइया के हो राखी बांधी जाती है और किसी को नहीं?
भइया नहीं है तो अम्मा, मैं तुम्हारे ही राखी बाँधूँगी। इस दुःख के समय भी पुत्री की बात सुनकर माता मुसकुराने लगी और बोली-अरी, तू इतनी बड़ी हो गयी। भला कहीं माँ के भी राखी बांधी जाती है? बालिका ने कहा-वाह, जो पैसा दे उसी के राखी बाँधी जाती है।
माता- अरी कँगली। पैसे भर के नहीं भाई ही के राखी बांधी जाती है। बालिका उदास हो गयी। माता घर का काम-काज करने लगी।
घर का काम पूरा करके उसने पुत्री से कहा-आ, तुझे नहला दूँ। बालिका मुख गंभीर करके बोली-मैं नहीं नहाऊँगी। माता-क्यों, नहायेगी क्यों नहीं? बालिका-मुझे क्या किसके राखी बाँधनी है?
माता-अरी, राखी नहीं बाँधनी है, तो क्या नहावेगी भी नहीं? आज त्यौहार का दिन है। चल, उठ नहा। बालिका- राखी नहीं बाँधूँगी, तो तिवहार काहे का?
माता- (कुछ कृद्ध होकर) अरी, कुछ ......हो गयी है? राखी-राखी रट लगी रखी है। बड़ा राखी बाँधना वाली बनी है। ऐसा ही होता तो आज यह दिन देखना पड़ता?
पैदा होते ही बाप को खो बैठी। ढाई बरस की होते-होते भाई का घर छुड़ा दिया। तेरे ही कर्मों से ये सब त्रास (नाश) हो गया। 10th - - बालिका बड़ी अप्रतिभ हुई और आँखों में आँसू भरे हुए चुपचाप नहाने को उठ खड़ी हुई।
एक घंटा पश्चात हम उसी बालिका को उसके घर के द्वार पर खड़ी देखते हैं। इसी समय भी उसके सुंदर मुख पर उदासी विद्यमान है। अब भी उसके बड़े-बड़े नेत्रों में पानी छलछला रहा है। परंतु बालिका इस समय द्वार पर क्यों?
जान पड़ता है, वह किसी कार्यवश खड़ी है क्योंकि उसके द्वार के सामने से जब कांडे निकालता है, तब वह खड़ी उत्सुकता से उसकी ओर ताकने लगती है। मानो वह मुख से कुछ कहे बिना केवल इच्छा-शक्ति ही से उस पुरुष